प्रणव कुमार अभय
नई दिल्ली: शिक्षा के केंद्र माने जाने वाले इलाकों में इन दिनों पढ़ाई की चर्चा से ज्यादा रसोई के बजट की चिंता गहरा रही है। घर से दूर रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं और कॉलेज की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए एलपीजी गैस सिलेंडर की लगातार बढ़ती कीमतें और उपलब्धता की चुनौतियां एक गंभीर समस्या बनकर उभरी हैं। मध्यम और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आने वाले छात्रों के लिए अब कमरे का किराया और कोचिंग की फीस भरने के बाद दो वक्त का भरपेट खाना बनाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं रह गया है।
पिछले कुछ महीनों में घरेलू गैस सिलेंडर के दामों में हुए उतार-चढ़ाव ने उन छात्रों की कमर तोड़ दी है जो सीमित मासिक खर्च (पॉकेट मनी) पर गुजर-बसर करते हैं। दिल्ली, प्रयागराज, पटना और कोटा जैसे शहरों में रहकर पढ़ाई कर रहे लाखों छात्र अब इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि वे अपनी किताबों पर खर्च करें या रसोई के ईंधन पर। रिपोर्ट के अनुसार, कई छात्र अब गैस बचाने के चक्कर में पौष्टिक भोजन से समझौता कर रहे हैं। सुबह-शाम का खाना बनाने के बजाय अब छात्र एक ही समय खाना बनाकर उसे दोनों वक्त चलाने को मजबूर हैं, जिसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य और मानसिक एकाग्रता पर पड़ रहा है। सिलेंडर की कीमतों के अलावा, छात्रों को गैस रिफिल कराने की प्रक्रिया में भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कई क्षेत्रों में कमर्शियल और घरेलू गैस की कालाबाजारी के कारण छात्रों को समय पर सिलेंडर नहीं मिल पाता। हॉस्टल या पीजी (पेइंग गेस्ट) में रहने वाले छात्रों के पास अक्सर स्थाई निवास प्रमाण पत्र न होने के कारण उन्हें नया गैस कनेक्शन लेने में कठिनाई होती है। ऐसे में वे निजी वेंडरों से महंगे दामों पर छोटे सिलेंडर खरीदने को मजबूर होते हैं, जो न केवल आर्थिक रूप से नुकसानदेह हैं, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी जोखिम भरे होते हैं। छोटे सिलेंडरों में गैस रिसाव की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं, जो घनी आबादी वाले छात्र क्षेत्रों में बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं। इस समस्या ने छात्रों के जीवन जीने के तरीके को भी बदल दिया है। अब छात्र गैस के विकल्प के रूप में बिजली से चलने वाले ‘इंडक्शन कुकटॉप’ की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, बिजली के बढ़ते बिल और कई पीजी मालिकों द्वारा भारी बिजली शुल्क वसूलने के कारण यह विकल्प भी पूरी तरह राहत देने वाला साबित नहीं हो रहा है। कुछ छात्र समूहों ने मिलकर ‘साझा रसोई’ (Shared Kitchen) का मॉडल अपनाया है, जहां 4-5 छात्र मिलकर एक ही सिलेंडर का उपयोग करते हैं और खर्चा आपस में बांट लेते हैं। लेकिन परीक्षा के समय जब हर छात्र का शेड्यूल अलग होता है, तब यह सामूहिक व्यवस्था भी पटरी से उतर जाती है।
विशेषज्ञों और शिक्षाविदों का मानना है कि यदि छात्रों के पोषण और स्वास्थ्य पर इसी तरह आर्थिक दबाव बना रहा, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव उनके शैक्षणिक प्रदर्शन पर पड़ेगा। सरकार और स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि छात्र बहुल इलाकों में रियायती दरों पर गैस उपलब्ध कराने के लिए विशेष ‘स्टूडेंट पास’ या ‘राशन कार्ड’ जैसी व्यवस्था पर विचार करें। साथ ही, गैस एजेंसियों को निर्देश दिए जाने चाहिए कि वे छात्रों को बिना जटिल कागजी कार्रवाई के छोटे और सुरक्षित सिलेंडर आसानी से उपलब्ध कराएं। जब तक ईंधन की कीमतों में स्थिरता नहीं आती और छात्रों को विशेष राहत नहीं मिलती, तब तक “पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया” का नारा इन छात्रों की रसोई की तपिश के बीच फीका पड़ता नजर आता रहेगा।
