डॉ. सत्य प्रकाश तिवारी
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता और समाजवादी पार्टी (सपा) पर उनके हमलों ने राजनीतिक चर्चा बढ़ा दी है। ओवैसी मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए सपा प्रमुख अखिलेश यादव की नीतियों पर सवाल खड़े कर रहे हैं। ऐसे में सपा के पारंपरिक समर्थक वर्ग पर उनके प्रभाव को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
ओवैसी अपनी जनसभाओं के जरिए उत्तर प्रदेश में पार्टी का जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। वे सपा और कांग्रेस सहित दूसरे दलों पर मुस्लिम समुदाय को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि मुस्लिमों को राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान और उचित प्रतिनिधित्व के लिए प्रयास करना चाहिए। हालांकि, उनकी रणनीति का आगामी चुनाव के नतीजों पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
ओवैसी की सक्रियता के बीच सपा के लिए अपने समर्थक वर्ग को एकजुट रखना महत्वपूर्ण होगा। अखिलेश यादव पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) रणनीति के जरिए व्यापक जनसमर्थन जुटाने पर जोर दे रहे हैं। वहीं, सपा और कांग्रेस ने 2027 के विधानसभा चुनाव में अपना गठबंधन जारी रखने की बात कही है। ओवैसी की ओर से विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की संभावना जताए जाने के बावजूद सपा की ओर से इस संबंध में सकारात्मक संकेत नहीं मिले हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड और पूर्वांचल के कई क्षेत्रों में ओवैसी की सक्रियता को चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका कई सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकती है। हालांकि, AIMIM की मौजूदगी से सपा को कितना नुकसान होगा, यह प्रत्याशियों, स्थानीय मुद्दों, गठबंधनों और मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।
इस बीच, अखिलेश यादव का 22 अक्टूबर को रामपुर दौरा और सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान से मुलाकात का कार्यक्रम भी राजनीतिक चर्चा में है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब ओवैसी रामपुर में सपा नेतृत्व और मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठा चुके हैं।
आगामी विधानसभा चुनाव में ओवैसी की सक्रियता सपा के लिए कितनी बड़ी चुनौती बनेगी, यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल, दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक बयानबाजी ने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक नया मुद्दा खड़ा कर दिया है। चुनाव नजदीक आने के साथ दोनों दलों की रणनीति और मतदाताओं के रुख पर सबकी नजर रहेगी।
