प्रणव कुमार दुबे
बिहार के जमुई जिले में एक नाबालिग छात्रा के साथ सरेराह हुई बर्बरता, छेड़छाड़ और मारपीट के वायरल वीडियो ने न केवल राज्य की कानून-व्यवस्था की कलई खोल दी है, बल्कि पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। वीडियो में जिस तरह से दबंगों की भीड़ एक अकेली, असहाय और रोती-बिलखती बच्ची को घेरकर उसे अपनी दरिंदगी का शिकार बना रही है, वह सभ्य समाज के माथे पर एक गहरा कलंक है।
इस वीभत्स घटना के सामने आने के बाद से ही बिहार की राजनीति में उबाल आ गया है और यह पूरा मुद्दा एक बड़े राजनीतिक घमासान में तब्दील हो चुका है। जहां एक ओर आम जनता में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है और लोग सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक न्याय की गुहार लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल इस संवेदनशील और अमानवीय मुद्दे पर भी अपनी सियासी रोटियां सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब बात महिला सुरक्षा की आती है, तो प्रशासनिक और राजनीतिक सिस्टम की संवेदनशीलता कहीं न कहीं दम तोड़ देती है।
इस जघन्य वारदात को लेकर विपक्ष ने बिहार की एनडीए सरकार पर चौतरफा और बेहद आक्रामक हमला बोल दिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे सीधे तौर पर समाज की सड़ी-गली पुरुषवादी मानसिकता का परिणाम बताया है। उन्होंने अपने बयान में स्पष्ट किया कि जब भीड़ खुद को ही कानून और संस्कृति का रक्षक समझने लगती है, तो ऐसी भयावह स्थितियां पैदा होती हैं, जहां मासूमों को मॉब जस्टिस का शिकार होना पड़ता है। उनके साथ ही बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार को आड़े हाथों लेते हुए राज्य में ‘गुंडाराज’ और ‘महा जंगलराज’ की वापसी का दावा किया है। तेजस्वी ने कड़े शब्दों में कहा कि आज बिहार में बेटियां न तो घर के अंदर सुरक्षित हैं और न ही सड़कों पर। उनका आरोप है कि सत्ता पक्ष अपराधियों को संरक्षण दे रहा है और पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है, जिसके चलते अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि वे सरेआम ऐसी वारदातों को अंजाम देकर कानून का मखौल उड़ा रहे हैं।
विपक्ष के इन तीखे हमलों के बाद सत्ता पक्ष की ओर से भी बचाव में बयानबाजियों का सिलसिला शुरू हो गया, लेकिन इस दौरान कुछ ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान भी सामने आए जिन्होंने आग में घी डालने का काम किया। जनता दल यूनाइटेड के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने सरकार का बचाव करते हुए दावा किया कि प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है और दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की जा रही है। लेकिन अपने इसी बयान में उन्होंने इस खौफनाक वारदात को महज एक ‘छिटपुट घटना’ करार दे दिया, जिसने एक नए और बड़े विवाद को जन्म दे दिया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी सरकार की नाकामियों को छिपाने के लिए एक बार फिर 2005 से पहले के राजद शासनकाल की याद दिलाते हुए कहा कि उस दौर में तो इससे भी बुरे हालात थे। वहीं, राज्य सरकार में मंत्री और बीजेपी नेताओं ने भी मोर्चा संभालते हुए कहा कि पुलिस ने फौरन एसआईटी का गठन कर लिया है और कई नामजद आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया गया है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि घटना के बाद सरकार का एक्शन तेज है और किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा, इसलिए विपक्ष को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर ओछी राजनीति नहीं करनी चाहिए।
लेकिन नेताओं की इस राजनीतिक बयानबाजी के बीच कई ऐसे गंभीर और चुभते हुए सवाल खड़े होते हैं, जिनका जवाब न तो सत्ता पक्ष के पास है और न ही विपक्ष के पास। सबसे बड़ा और सीधा सवाल सत्ताधारी दल से है कि एक मासूम बच्ची के साथ हुई इतनी खौफनाक और रूह कंपा देने वाली वारदात आखिर उनकी नजर में ‘छिटपुट घटना’ कैसे हो सकती है? क्या एक महिला के आत्मसम्मान और उसकी गरिमा के तार-तार होने को महज इसलिए कमतर आंका जा सकता है क्योंकि वह एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में फिट नहीं बैठती? क्या वर्तमान सरकार अपनी पुलिस और कानून-व्यवस्था की नाकामी को छिपाने के लिए हमेशा 2005 से पहले के इतिहास का सहारा लेती रहेगी? क्या यह एक लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह अपनी वर्तमान विफलताओं को स्वीकार करे और भविष्य के लिए एक सुरक्षित माहौल तैयार करे, न कि अतीत की गलतियों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले? एक बच्ची की चीखें अगर सत्ता के कानों तक नहीं पहुंच पा रही हैं, तो यह सीधे तौर पर सिस्टम के संवेदनहीन होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
दूसरी ओर, विपक्ष की भूमिका पर भी उतने ही गंभीर सवालिया निशान उठते हैं। क्या विपक्ष के लिए महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध केवल सोशल मीडिया पर ट्वीट करने, सरकार को घेरने और ‘जंगलराज’ का टैग लगाने का एक राजनीतिक हथियार भर बनकर रह गए हैं? जब-जब ऐसी घटनाएं घटती हैं, नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उस पीड़िता को न्याय दिलाने या समाज में एक सुरक्षित माहौल बनाने के लिए कोई ठोस और संयुक्त प्रयास क्यों नहीं किया जाता? जमुई की इस घटना ने हमारी राजनीतिक व्यवस्था की उस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है जहां एक बच्ची का दर्द और उसके आंसू केवल एक सियासी मुद्दा बनकर रह जाते हैं। जब तक हमारे राजनेता दलगत राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप के इस दुष्चक्र से बाहर निकलकर महिला सुरक्षा के लिए एक दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगे, तब तक बेटियां यूं ही दरिंदों का शिकार होती रहेंगी और न्याय केवल फाइलों और खोखले भाषणों के पन्नों में ही दफन होकर रह जाएगा।
