प्रताप सिंह भाटी
आज आधुनिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चर्चा व्यापक हो गई है, तब “घूंघट” को लेकर मतभेद भी स्वाभाविक रूप से सामने आने लगे हैं। कुछ लोग घूंघट को कुरीति और दमन का प्रतीक मानते हैं, तो कुछ इसे सम्मान, शृंगार और परंपरा का हिस्सा समझते हैं।
प्रश्न यह नहीं कि घूंघट सही है या गलत प्रश्न यह है कि इसे किस दृष्टि से देखा जाए ? ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भारतीय कला और परंपराओं में स्त्रियों द्वारा सिर ढकने की परंपरा प्राचीन काल से दिखाई देती है। भारतीय प्राचीन कलाकृतियां आंचल या सिर ढके रूप में चित्रित हैं। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि सिर पर पल्लू रखना केवल मध्यकालीन प्रभाव नहीं था।हालाँकि यह भी सत्य है कि समय के साथ विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों में पर्दा-प्रथा के रूप बदलते गए। कहीं यह शालीनता का प्रतीक रहा, तो कहीं सामाजिक मर्यादा का हिस्सा। इसलिए इतिहास को एक रेखीय दृष्टि से देखना उचित नहीं है।
सांस्कृतिक और सौंदर्यात्मक पक्ष
घूंघट को लोकजीवन में सौंदर्य और लज्जा के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है। विवाह जैसे पवित्र अवसर पर दुल्हन का घूंघट भारतीय परिधान का अभिन्न अंग माना जाता है। लोकगीतों और फ़िल्मी गीतों में भी इसका भावनात्मक चित्रण हुआ है। गीतों में घूंघट सौंदर्य, आकर्षण और प्रेम का प्रतीक है। इससे सांस्कृतिक संदर्भ में घूंघट का अर्थ केवल बंधन नहीं, बल्कि भावनात्मक और कलात्मक अभिव्यक्ति भी रहा है। आलोचको द्वारा घूंघट के विरोध में कई तर्क जाते हैं जैसे कि यह स्त्री स्वतंत्रता में बाधा है, यह रूढ़िवादी परंपरा है, या इसे ज़बरदस्ती लागू किया जाता है। इन तर्कों के पीछे कुछ सामाजिक अनुभव अवश्य रहे हैं। भारत के कई क्षेत्रों में सामाजिक दबाव के कारण महिलाओं को घूंघट करना पड़ा होगा, जिससे यह बहस जन्मी हो कि क्या यह स्वेच्छा है या बाध्यता।
समाज में परिवर्तन स्वाभाविक है। आज स्त्री शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन और निर्णय लेने की क्षमता को महत्व दिया जाता है। ऐसे में यदि कोई महिला अपनी संस्कृति के अनुरूप घूंघट धारण करना चाहती है, तो यह उसका अधिकार है। उसी प्रकार यदि कोई महिला इसे न अपनाने का निर्णय लेती है, तो वह भी समान रूप से सम्मान की अधिकारी है। इतिहास यह भी बताता है कि वस्त्र स्वयं प्रगति का निर्धारण नहीं करते। उदाहरण के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने परंपरागत परिवेश में पली-बढ़ी होने के बावजूद असाधारण साहस और नेतृत्व का परिचय दिया। स्त्री की शक्ति उसके वस्त्रों में नहीं, बल्कि उसके आत्मविश्वास और अवसरों में निहित है। इसलिए घूंघट को सिर्फ कुरीति घोषित कर देना सही नहीं है और उसे आलोचना से परे मान लेना भी उचित नहीं। किसी भी परंपरा का मूल्य इस बात से तय होता है कि वह स्वेच्छा पर आधारित है या बाध्यता पर। अंततः समाज को यह स्वीकार करना होगा कि घूंघट का प्रश्न वस्त्र से अधिक “चयन” का प्रश्न है। परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन भी तभी संभव है, जब हम स्त्री के अधिकार, सम्मान और स्वतंत्र निर्णय को सर्वोपरि रखें।
