आदित्य
आज के इस बदलते परिवेश में यह सुनने को मिलता है कि “अब आधुनिक समय है, छुआछूत और जातिवाद खत्म हो चुका है, तो फिर आरक्षण की क्या आवश्यकता?” यह तर्क नई पीढ़ी के युवाओं द्वारा दिया जाता है, जिनके पूर्वजों के पास पिछले 3000 सालों से अपने-अपने क्षेत्र में 100% आरक्षण था। लेकिन क्या जातिवाद की जड़ें पूरी तरह से समाप्त हो गई हैं, या हम केवल इसकी सतह को देख रहे हैं?
जातिवाद का असली अर्थ
अक्सर युवाओं को जातिवाद इसलिए नहीं दिखता क्योंकि उन्हें इसका अर्थ ही नहीं पता। जातिवाद केवल छुआछूत नहीं, बल्कि एक ऐसी विचारधारा और सामाजिक बुराई है जिसमें व्यक्ति अपनी जाति के प्रति अंधी निष्ठा रखता है। यह एक ऐसी सोच है जो समाज को ‘हम’ और ‘वे’ में विभाजित कर देती है। समाज में ऊंच-नीच का आधार जन्म से ही तय करना सबसे बड़ा अन्याय है। यहीं से असमानता की शुरुआत होती है। जब तक समाज में योग्यता के बजाय जाति के आधार पर मानसिक धारणाएं बनी रहेंगी, तब तक यह कहना गलत होगा कि जातिवाद खत्म हो गया है।
आरक्षण की आवश्यकता क्यों?
आरक्षण का मूल उद्देश्य समानता को धरातल पर लाना है। यह उन लोगों के लिए सहारा है जिन्हें सदियों से पीछे धकेला गया। इसका उद्देश्य व्यक्ति को पिछड़ेपन की धारा से मुक्त करना है। आज के समय में आरक्षण को लेकर जो विरोध देखा जाता है, उसका कारण ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा है। कुछ लोगों को यह इसलिए पसंद नहीं कि कोई दूसरा उनसे आगे निकल रहा है जबकि वे स्वयं उस गति से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
निष्कर्ष
आधुनिक होने का अर्थ केवल तकनीक का उपयोग करना नहीं, बल्कि अपनी सोच को व्यापक बनाना है। जब तक हम जातिगत श्रेष्ठता की भावना को पूरी तरह त्याग कर हर मनुष्य को समान सम्मान नहीं देंगे, तब तक ‘आरक्षण’ और ‘जातिवाद’ जैसे विषय समाज में चर्चा और विवाद का केंद्र बने रहेंगे।
