दिन ढलने को था।

ट्रेन लगभग एक घंटे की देरी से चल रही थी।

मन में एक हल्का सा उत्साह था।

 

मैं खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था,

लेकिन उस दिन नज़ारे कुछ अलग थे।

हवा में एक अजीब सा खिंचाव था,

जैसे कोई जगह मुझे अपने पास बुला रही हो।

 

वह जगह थी

दिनकर ग्राम सिमरिया,

मेरे प्रिय राष्ट्रकवि

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की जन्मभूमि।

 

काफी समय से मन में एक इच्छा थी

कि उस मिट्टी को देखूं,

जहां से दिनकर जी जैसे तेजस्वी कवि की आवाज उठी थी।

 

पर एक ही बाधा थी

ट्रेन वहां रुकती नहीं थी।

बस दूर से गुजर जाना ही जैसे तय था।

 

लेकिन उस दिन

जैसे कहानी ने खुद करवट ली।

 

अचानक ट्रेन की रफ्तार धीमी होने लगी।

खिड़की से बाहर देखा, लाल सिग्नल।

धीरे धीरे ट्रेन रुक गई।

 

एक पल के लिए सब थम गया।

 

नज़र प्लेटफॉर्म के बोर्ड पर गई,

लिखा था

दिनकर ग्राम सिमरिया।

 

दिल थोड़ा तेज धड़कने लगा।

अंदर से एक आवाज आई

यही मौका है।

 

मैं बिना ज्यादा सोचे नीचे उतर गया।

 

प्लेटफॉर्म पर न कोई भीड़ थी,

न कोई शोर।

बस एक सादगी,

एक शांत सा ठहराव।

 

हवा में मिट्टी की खुशबू थी,

और उस मिट्टी में जैसे

दिनकर जी के शब्द अब भी जिंदा थे।

 

कुछ कदम आगे बढ़ा तो एहसास हुआ

कि मैं किसी साधारण गांव में नहीं,

बल्कि इतिहास के एक जीवंत हिस्से में चल रहा हूं।

 

वही धरती,

वही रास्ते,

वही हवा

जिन्होंने कभी एक कवि के भीतर ज्वाला जगाई होगी।

 

मैंने फोन निकाला,

कुछ तस्वीरें लीं,

लेकिन सच यह है

कि उस पल को कोई कैमरा पकड़ नहीं सकता।

 

वह एक एहसास था,

एक जुड़ाव

जो शब्दों से कहीं ज्यादा गहरा था।

 

तभी इंजन की सीटी सुनाई दी।

समय कम था।

 

मैं वापस ट्रेन में चढ़ गया,

लेकिन मन वहीं रह गया,

सिमरिया की उस शांत मिट्टी पर।

 

ट्रेन फिर चल पड़ी,

पर सफर अब वैसा नहीं था।

 

अब मेरे साथ एक अनुभव था,

एक अनकही सी कहानी

जो उस अचानक मिले ठहराव ने मुझे दे दी।

 

कभी कभी

जिंदगी के अनियोजित ठहराव ही

सबसे खूबसूरत यादें बन जाते हैं।

 

अंत में

एक प्रशंसक की ओर से

 

दिनकर जी,

आपके शब्द सिर्फ कविता नहीं हैं,

वे साहस हैं,

वे चेतना हैं,

वे आत्मा को जगाने वाली अग्नि हैं।

 

आज आपकी जन्मभूमि की मिट्टी को छूकर

यह एहसास और गहरा हो गया

कि आपके विचार आज भी जिंदा हैं,

और रहेंगे

 

जब तक इस देश में

शब्दों की शक्ति

और स्वाभिमान की लौ

जलती रहेगी।

लेखक=आदित्य शुक्ला

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