डॉ सत्य प्रकाश तिवारी/ नई दिल्ली
दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर स्थित अकादमिक शोध केंद्र में शनिवार को ‘वैश्विक अध्ययन केंद्र’ (DU) तथा ‘सभ्यता अध्ययन केंद्र’ के संयुक्त तत्वाधान में तीसरी मासिक गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। “युवा और आत्महत्याएं: शिक्षा एवं अनिश्चित भविष्य” विषय पर आयोजित इस गोष्ठी को हाल ही में राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में अत्यंत प्रासंगिक और सामयिक माना जा रहा है। इस विशेष कार्यक्रम में देश भर के कई प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों, शोधकर्ताओं और छात्र प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और युवाओं में बढ़ती मानसिक हताशा पर गहराई से चर्चा की।
गोष्ठी में मुख्य वक्तव्य देते हुए सभ्यता अध्ययन केंद्र के निदेशक श्री रवीशंकर जी ने कहा कि आज युवाओं में बढ़ती निराशा, आक्रोश और आत्महत्या की प्रवृत्ति बेहद चिंताजनक मोड़ पर पहुँच चुकी है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि देश के विद्वानों और नीति-निर्माताओं को इस समस्या पर तुरंत और गंभीर चिंतन करने की जरूरत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विकराल स्थिति से निपटने के लिए व्यक्ति, परिवार, समाज और राज्य—इन सभी घटकों को मिलकर अपने-अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करना होगा, तभी देश का युवा मानसिक रूप से सशक्त होकर राष्ट्र निर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका निभा सकेगा।
युवाओं के मानसिक तनाव के व्यावहारिक कारणों पर प्रकाश डालते हुए सभ्यता अध्ययन केंद्र के उपाध्यक्ष श्री प्रकाश चंद्र जी ने आधुनिक जीवन शैली और सामाजिक दबावों को मुख्य वजह बताया। वहीं, पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज के आचार्य डॉ. हरीश अरोड़ा ने शैक्षणिक प्रणाली की कमियों पर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि आज के युवाओं पर हर प्रतियोगिता में अव्वल आने और हर हाल में अच्छी नौकरी पाने का अत्यधिक मनोवैज्ञानिक दबाव है, जो उन्हें इस आत्मघाती कदम की ओर धकेलता है। गोष्ठी में छात्रों का पक्ष रखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की छात्रा सिया कौशिक ने कहा कि शिक्षकों और छात्रों के बीच संवाद की कमी एक बड़ी समस्या है। उन्होंने मांग उठाई कि सभी शैक्षणिक संस्थानों में योग्य मनोचिकित्सकों की नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए ताकि छात्रों को समय पर सही परामर्श और संबल मिल सके। गोष्ठी के आयोजक और प्रसिद्ध लेखक श्री अवधेश जी ने भी इस विषय को एकांगी दृष्टिकोण के बजाय समग्रता (होलिस्टिक अप्रोच) के साथ संबोधित करने पर जोर दिया।
कार्यक्रम के समापन सत्र में वैश्विक अध्ययन केंद्र के उप निदेशक डॉ. महेश कौशिक ने ठोस और व्यावहारिक उपायों को रेखांकित किया। उन्होंने सुझाव दिया कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के पूरे पाठ्यक्रम में ‘जीवन कौशल शिक्षा’ (Life Skills Education) को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। डॉ. कौशिक ने स्पष्ट किया कि इसके लिए सबसे पहले शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण देना होगा और अभिभावकों के लिए भी समय-समय पर परामर्श सत्र आयोजित करने होंगे ताकि वे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर ढंग से समझ सकें। अंत में उपस्थित सभी विद्वानों ने इस बात पर पूर्ण सहमति जताई कि युवाओं को अवसाद और निराशा से बाहर निकालने के लिए सामूहिक तथा जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है।
