प्रणव कुमार दुबे
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा जमुई पीड़िता के परिवार से मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट किए जाने के बाद एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस संवेदनशील मुलाकात की फोटो को बाकायदा फेसबुक पर सार्वजनिक किया गया था। हालांकि कानूनी उल्लंघनों और सोशल मीडिया पर बढ़ते विरोध के बाद इस तस्वीर को लगभग 18 मिनट के भीतर हटा लिया गया, लेकिन तब तक इसके स्क्रीनशॉट व्यापक रूप से प्रसारित हो चुके थे। इस पूरी घटना ने पीड़िता और उसके परिवार की पहचान सार्वजनिक होने के गंभीर मुद्दे को जन्म दिया है।
कानूनी प्रावधानों के तहत यौन अपराधों की पीड़िताओं और उनके परिजनों की पहचान को गोपनीय रखना अनिवार्य माना गया है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 72 के तहत उन सभी मामलों में सख्त मनाही है जो BNS की धारा 64 से 71 के दायरे में आते हैं। किसी भी माध्यम से पीड़िता या उसके परिवार का नाम, चेहरा अथवा पहचान उजागर करने वाली किसी भी जानकारी को साझा करना एक संज्ञेय अपराध है। कानून के अनुसार, इस नियम का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को दो साल तक की कारावास और जुर्माने की सजा दी जा सकती है।
इस घटना के बाद बिहार पुलिस के रवैये को लेकर भी तीखी बहस शुरू हो गई है। हाल के दिनों में बिहार पुलिस ने इसी मामले से संबंधित वीडियो शेयर कर पीड़िता की पहचान उजागर करने के आरोप में कई आम लोगों पर मामले दर्ज किए थे और उनकी गिरफ्तारियां भी की थीं। ऐसे में अब यह सवाल जोर-शोर से उठ रहा है कि जो कानून आम नागरिकों पर इतनी सख्ती से लागू किया जाता है, क्या वही कानून मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और उनके ऑफिस स्टाफ पर भी समान रूप से लागू होगा।
फेसबुक रिकॉर्ड्स से साफ जाहिर है कि यह तस्वीर लगभग 18 मिनट तक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मौजूद रही, जिससे पीड़िता के परिवार की गोपनीयता पर असर पड़ा। आलोचक और कानूनी विशेषज्ञ अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़िता के परिवार के साथ फोटो खिंचवाने और उसे तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के पीछे क्या मंशा थी। फोटो हटा लिए जाने के बाद भी यह विवाद शांत नहीं हुआ है और इस पर निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई की मांग की जा रही है।
