आदित्य शुक्ला
गंडक नदी के जलस्तर में अचानक हुए उछाल और जलधारा की प्रचंड गति ने कछारी एवं निचले इलाकों में तबाही का खौफनाक मंजर पैदा कर दिया है। नदी की तेज़ उफनती धाराएं लगातार तटबंधों और उपजाऊ जमीनों से टकराकर भयानक कटाव कर रही हैं। देखते ही देखते किसानों की हरी-भरी फसलें—जैसे धान, गन्ना और मौसमी सब्जियां—दर्जनों एकड़ ज़मीन के साथ गंडक के खौलते पानी में समाती जा रही हैं। नदी का यह आक्रामक रूप इतना भयावह है कि कटान की आवाज़ दूर-दूर तक सुनाई दे रही है, जिससे किनारे बसे गांवों में चीख-पुकार और अफरातफरी का माहौल बन गया है। पलक झपकते ही बीगों ज़मीन नदी का हिस्सा बन रही है और ग्रामीण बेबस होकर अपनी आंखों के सामने अपनी जीवनभर की कमाई को जलसमाधि लेते देखने को मजबूर हैं।
इस भीषण कटाव ने क्षेत्र की पूरी अर्थव्यवस्था और जनजीवन को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। किसानों की उपजाऊ भूमि जलमग्न और विलीन होने से उनके सामने अब आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है; बैंक से लिए गए कर्ज और फसल लागत डूबने की चिंता में कई किसान भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। इसके साथ ही, गांवों को जिला मुख्यालय और स्थानीय बाजारों से जोड़ने वाले मुख्य पिच रोड और कच्चे पगडंडी रास्ते कटाव की ज़द में आकर पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं। संपर्क टूट जाने की वजह से कई टोलों का शेष दुनिया से नाता कट चुका है, जिससे मरीजों को अस्पताल ले जाने, बच्चों के स्कूल जाने और दैनिक राशन की आपूर्ति में विकट बाधाएं आ रही हैं।
गंडक के लगातार बढ़ते दबाव और आबादी की ओर तेजी से खिसकती नदी की धारा ने कछारी इलाकों और तटबंधों पर बसे हजारों लोगों की रातों की नींद उड़ा दी है। नदी का रुख गांव के पक्के मकानों और झोपड़ियों की तरफ तेजी से बढ़ रहा है, जिससे बेघर होने का डर हर चेहरे पर साफ़ देखा जा सकता है। अनहोनी की आशंका के चलते दर्जनों परिवारों ने एहतियाती तौर पर खुद ही अपने पक्के मकानों की ईंटें और झोपड़ियों के टिन-छप्पर उखाड़ना शुरू कर दिया है। लोग अपने मवेशियों, अनाज के कोठिलों और घरेलू सामानों को ट्रैक्टरों व बैलगाड़ियों पर लादकर दूर ऊंचे सरकारी बांधों या राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे शरण लेने को मजबूर हो रहे हैं। रात भर ग्रामीण हाथों में टॉर्च और लाठियां लेकर नदी के किनारों पर गश्त लगा रहे हैं ताकि कटान की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा सके।
दूसरी ओर, आपदा के इस भयावह मोड़ पर पहुंचने के बावजूद स्थानीय प्रशासन और जल संसाधन विभाग के उदासीन रवैये को लेकर ग्रामीणों में भारी जनाक्रोश पनप रहा है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि मानसून आने से पहले कटाव-रोधी कार्यों के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट कागजों पर बहा दिया जाता है, लेकिन धरातल पर कोई ठोस काम नहीं होता। वर्तमान में भी बाढ़ नियंत्रण विभाग द्वारा केवल नाममात्र की बालू भरी बोरियां (जिओ बैग्स) डालकर खानापूर्ति की जा रही है, जो उफनती नदी की धारा के सामने ताश के पत्तों की तरह बह जाती हैं। यदि समय रहते बड़े बोल्डर पिचिंग और मजबूत जिओ-ट्यूब्स के जरिए कटान रोकने के ठोस और कड़े इंतजाम नहीं किए गए, तो दर्जनों गांव पूरी तरह से नक्शे से मिट जाएंगे और जान-माल का भयानक नुकसान हो सकता है।
वर्तमान में गंडक नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में स्थिति अत्यंत चिंताजनक और बेकाबू बनी हुई है, जहाँ चारों तरफ सिर्फ तबाही और बेबसी का सन्नाटा पसरा है। बेघर हुए और खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर प्रभावित लोग अब केवल भगवान और प्रशासनिक राहत के भरोसे दिन काट रहे हैं। पीड़ित ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि बिना किसी देरी के एनडीआरएफ व एसडीआरएफ की टीमें तैनात की जाएं, युद्धस्तर पर कटावरोधी कार्य शुरू कराए जाएं और प्रभावित परिवारों के लिए तिरपाल, सूखा राशन, पेयजल तथा चिकित्सा सुविधाओं के साथ-साथ मुकम्मल मुआवजे का तत्काल प्रबंध किया जाए, ताकि इस विनाशकारी प्राकृतिक आपदा से उनके आशियाने और जिंदगियां बचाई जा सकें।
