संवाददाता पटना
बिहार के बहुचर्चित पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के एमएलसी चुनाव के दौरान राजनीतिक गलियारों में मची हलचल अब केवल एक साधारण विधान परिषद सीट के चुनावी परिणामों या उसके अंकगणितीय समीकरणों तक सीमित नहीं रह गई है। चुनाव प्रचार और जनसंपर्क के इस हाई-प्रोफाइल बहाने से मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पार्टी के भावी राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में रखे जाने वाले निशांत कुमार और जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा को लेकर जिस प्रकार के सनसनीखेज बयान दिए गए हैं, उसने सत्ताधारी दल जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के भीतर बरसों से पर्दे के पीछे सुलग रही अंदरूनी कलह और शक्ति संघर्ष को सीधे तौर पर एक खुली किताब की तरह जनता के सामने लाकर रख दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि इन बयानों की तासीर और तेवर महज किसी व्यक्तिगत नाराजगी या आवेश का परिणाम नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे आने वाले दिनों की किसी बड़ी सियासी पटकथा, गुटगत वर्चस्व की लड़ाई और पार्टी के अंदरूनी ढांचे में होने वाले संभावित बड़े बदलावों के साफ संकेत छिपे हुए हैं, जो आने वाले समय में बिहार की पूरी राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।
इस बेहद जटिल और उलझे हुए आंतरिक विवाद की कहानी की शुरुआत भले ही विधायक अनंत सिंह के तीखे तेवरों और पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारी के संदर्भ में उपजे विरोध से हुई हो, लेकिन जब इस पूरे मामले को सुलझाने और डैमेज कंट्रोल करने की आधिकारिक कमान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के हाथों में सौंपी गई, तो मामला सुलझने के बजाय और अधिक विस्फोटक मोड़ लेता चला गया। ललन सिंह के एक बयान और उसके बाद के सियासी घटनाक्रम के बाद इस राजनीतिक आग की चपेट में केवल अकेले अनंत सिंह ही नहीं आए, बल्कि विधान पार्षद नीरज कुमार और खुद केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का राजनीतिक कद भी इस विवाद के सीधे घेरे में आ गया। अब वर्तमान परिस्थिति इस अत्यंत संवेदनशील और गंभीर धरातल पर जा पहुंची है जहाँ यह सवाल बड़े पैमाने पर उठने लगा है कि जब पार्टी गतिविधियों के विरोध या अनुशासनहीनता के दायरे में दोनों ही पक्ष किसी न किसी रूप में शामिल दिखाई दे रहे हैं, तो फिर पार्टी आलाकमान की तरफ से अनुशासनात्मक गाज या कार्रवाई सिर्फ एकतरफा तौर पर केवल अनंत सिंह पर ही क्यों गिराई जानी चाहिए, जबकि दोनों तरफ से बयानों के तीर छोड़े गए हैं और अनुशासन की धज्जियां उड़ाई गई हैं।
यह विवाद और सियासी घमासान तब अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया जब पार्टी के प्रांतीय संगठन, उसकी कार्यशैली और इसके शीर्ष नेतृत्व की भूमिका पर ही सीधे तौर पर गंभीर सवालिया निशान खड़े होने लगे। राजनीतिक हलकों में इस बात की पुरजोर और तीखी चर्चा है कि जब बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान अनंत सिंह की तरफ से लगातार गंभीर बयान और आरोप आ रहे थे, तब जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने समय रहते कोई त्वरित, कठोर या निर्णायक दंडात्मक कदम क्यों नहीं उठाया और वे पूरी स्थिति पर आंखें मूंदकर मूकदर्शक की तरह क्यों बैठे रहे। सबसे अधिक चौंकाने वाली, हैरान करने वाली और राजनीतिक रूप से भूचाल लाने वाली बात यह है कि संगठन के शीर्ष पद पर बैठे प्रदेश अध्यक्ष की इस संदेहास्पद कार्यशैली और निष्क्रियता पर यह सवाल किसी सामान्य बूथ स्तर के कार्यकर्ता या विपक्षी दल के नेता द्वारा नहीं उठाया गया, बल्कि खुद जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान में केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह के बयानों और उसके बाद उपजे राजनीतिक परिदृश्य के दायरे से सतह पर आया है, जिसने पार्टी के भीतर चल रहे अंतर्विरोध को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
इन तमाम अभूतपूर्व और एक के बाद एक सामने आ रहे राजनीतिक घटनाक्रमों, पार्टी के दिग्गजों के परस्पर विरोधी रुख और सार्वजनिक रूप से हो रही बयानबाजी की बौछार ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का यह चुनाव केवल एक विधान परिषद की सीट जीतने की कवायद नहीं रह गया है, बल्कि यह जदयू के भीतर सालों से अंदरखाने सुलग रही गुटबाजी और नेतृत्व की खींचतान का एक खुला और बेकाबू अखाड़ा बन चुका है। जैसे-जैसे मतदान की तारीख और सरगर्मी अपने चरम की ओर बढ़ रही है, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच का यह आपसी टकराव, बयानबाजी का दौर और एक-दूसरे पर वर्चस्व स्थापित करने की होड़ न केवल इस विशेष चुनाव के परिणाम को गहरे तौर पर प्रभावित करेगी, बल्कि आने वाले दिनों में बिहार की मुख्यधारा की राजनीति और खुद जदयू के भावी संगठनात्मक व वैचारिक ढांचे पर एक बहुत ही दूरगामी और गहरा प्रभाव छोड़ती हुई नजर आ रही है।
