प्रणव कुमार दुबे
पटना: बिहार के जमुई में नाबालिग लड़की के साथ हुई छेड़खानी के संवेदनशील मामले ने अब एक बड़े कानूनी और प्रशासनिक विवाद का रूप ले लिया है। मुख्यमंत्री कार्यालय के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से पीड़िता और उसके परिजनों की पहचान उजागर करती तस्वीर पोस्ट होने के बाद पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। पटना के सचिवालय थाने में बिहार CMO के स्टेनोग्राफर सागर प्रसाद समेत अन्य संबंधित कर्मियों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। यह पूरी कार्रवाई पॉक्सो (POCSO) एक्ट और भारतीय न्याय संहिता के कड़े प्रावधानों के तहत की गई है, जिससे राज्य के प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।
यह विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब जमुई कांड की नाबालिग पीड़िता अपने परिजनों के साथ न्याय की गुहार लगाने और सुरक्षा का आश्वासन पाने के लिए मुख्यमंत्री से मुलाकात करने पहुंची थी। मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री ने पीड़ित परिवार को निष्पक्ष जांच, त्वरित सुनवाई (फास्ट ट्रैक कोर्ट) और आरोपियों को कठोरतम सजा दिलाने का पूरा भरोसा दिया। हालांकि, इस सकारात्मक मुलाकात के तुरंत बाद मुख्यमंत्री के आधिकारिक ‘X’ हैंडल से मुलाकात की कई तस्वीरें साझा कर दी गईं। इन तस्वीरों में पीड़िता का चेहरा बिना धुंधला किए स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। यद्यपि गलती का अहसास होते ही कुछ ही मिनटों के भीतर पोस्ट को डिलीट कर दिया गया, लेकिन तब तक सोशल मीडिया पर इसके स्क्रीनशॉट तेजी से वायरल हो चुके थे।
नाबालिग पीड़िता का चेहरा सार्वजनिक होना कानूनी रूप से बेहद गंभीर अपराध माना जाता है। पुलिस द्वारा दर्ज मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 73, पॉक्सो एक्ट की धारा 23 तथा आईटी एक्ट की धारा 66E और 67 को शामिल किया गया है। पॉक्सो कानून की धारा 23 स्पष्ट रूप से किसी भी मीडिया माध्यम, संस्था या व्यक्ति द्वारा यौन अपराधों या उत्पीड़न की शिकार नाबालिगों की पहचान उजागर करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल फॉरेंसिक टीम के जरिए यह जांच की जा रही है कि यह सिर्फ एक तकनीकी चूक थी या प्रशासनिक लापरवाही। इसके साथ ही, जिन अन्य सोशल मीडिया अकाउंट्स ने इस फोटो को रीपोस्ट या शेयर किया है, उन पर भी कानूनी तलवार लटक रही है।
तस्वीर वायरल होते ही राज्य का राजनीतिक पारा चढ़ गया और विपक्षी दलों ने सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख नेताओं और नेता प्रतिपक्ष ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए इसे कानून का घोर उल्लंघन करार दिया। विपक्ष ने सवाल उठाया कि जो सरकार आम नागरिकों को कानूनों का पालन करने की सीख देती है, उसी के शीर्ष कार्यालय में पॉक्सो जैसे बेहद संवेदनशील कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि पहचान उजागर होने से पीड़िता और उसके परिवार की सामाजिक सुरक्षा और गोपनीयता दांव पर लग गई है, इसलिए केवल छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाने के बजाय पूरे सोशल मीडिया प्रबंधन की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
फिलहाल, जमुई छेड़खानी मामले में पुलिस मुख्य आरोपियों को पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है, लेकिन सोशल मीडिया हैंडल की इस एक चूक ने पूरी राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस घटनाक्रम ने सरकारी विभागों और मंत्रियों के सोशल मीडिया हैंडल्स को संचालित करने वाली टीमों की कार्यप्रणाली तथा संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि पुलिस की फॉरेंसिक जांच में इस मामले की अंतिम जिम्मेदारी किस पर तय होती है और प्रशासनिक स्तर पर क्या नए दिशानिर्देश जारी किए जाते हैं।
