डॉ सत्य प्रकाश तिवारी
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी राजनीति में एक भूचाल ला देने वाले अप्रत्याशित घटनाक्रम में, कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक और युवा राजनेता अभिजीत दीपके ने सीधे तौर पर भारतीय निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और उसकी सर्वोच्च लीडरशिप के खिलाफ एक अभूतपूर्व मोर्चा खोल दिया है। राजधानी दिल्ली में आयोजित एक खचाखच भरी और बेहद तनावपूर्ण विशेष प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए, दीपके ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता, पारदर्शिता और उसकी संवैधानिक सत्यनिष्ठा पर अब तक के सबसे तीखे और सीधे प्रहार किए हैं। इस दौरान उन्होंने एक बेहद चौंकाने वाला और आक्रामक कदम उठाते हुए भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अपना पद छोड़ने के लिए महज 48 घंटे का एक अत्यंत सख्त अल्टीमेटम जारी कर दिया है। भारतीय राजनीति के इतिहास में किसी भी राजनीतिक दल द्वारा एक शीर्ष, स्वतंत्र और स्वायत्त संवैधानिक संस्था के प्रमुख को इस तरह का सीधा और समयबद्ध अल्टीमेटम देना एक असाधारण और दुर्लभ घटना मानी जा रही है। दीपके के इस खुले चैलेंज ने न केवल दिल्ली के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक नया सियासी हड़कंप मचा दिया है, बल्कि आगामी चुनावों की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर पूरे देश में एक नई और तीखी राष्ट्रीय बहस को भी जन्म दे दिया है।
इस अभूतपूर्व अल्टीमेटम और तीखे विरोध के पीछे की मुख्य वजहों का विस्तार से खुलासा करते हुए सीजेपी प्रमुख ने मतदाता सूचियों में कथित तौर पर की गई व्यापक, सुनियोजित और राज्य-प्रायोजित गड़बड़ियों को लेकर अपनी गहरी और गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। उन्होंने निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में संचालित की गई विशेष गहन प्रक्रिया को पूरी तरह से सवालों के घेरे में खड़ा करते हुए एक बेहद सनसनीखेज दावा किया है कि देशभर में एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश के तहत लगभग 12 करोड़ से अधिक वैध और वास्तविक मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से रातों-रात बेबुनियाद कारणों से हटा या गायब कर दिए गए हैं। दीपके ने चुनाव आयोग की वर्तमान भूमिका पर सीधा और तीखा निशाना साधते हुए कहा कि वर्तमान परिदृश्य में यह पूरी चुनावी प्रक्रिया अब महज़ एक ‘फिक्स मैच’ की तरह प्रतीत हो रही है, जहां मतदान की वास्तविक प्रक्रिया शुरू होने से काफी पहले ही जीत-हार की स्क्रिप्ट, नतीजे और मार्जिन तक तय कर लिए गए हैं। उनके अनुसार, जब चुनाव का प्रबंधन और निगरानी करने वाली सर्वोच्च संवैधानिक संस्था ही कथित रूप से पक्षपाती होकर काम कर रही हो, तो ऐसे दिखावटी, पूर्व-नियोजित और औपचारिकता मात्र रह गए चुनावों में हिस्सा लेना आम जनता के अमूल्य लोकतांत्रिक अधिकारों, उनके वोट की पवित्रता और लोकतंत्र की मूल भावना के साथ सीधा खिलवाड़ करने जैसा है।
अल्टीमेटम की 48 घंटे की समयसीमा समाप्त होने के बाद की अपनी रणनीतिक और आक्रामक कार्ययोजना को मीडिया के सामने साझा करते हुए सीजेपी प्रमुख ने बेहद सख्त और चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तय समय के भीतर स्वेच्छा से अपना इस्तीफा नहीं सौंपते हैं, तो उनकी पार्टी पूरे भारतवर्ष में एक अभूतपूर्व, व्यापक और उग्र जन-आंदोलन का शंखनाद करेगी। दीपके ने मंच से यह स्पष्ट किया है कि यह केवल मीडिया का ध्यान खींचने के लिए दी गई कोई खोखली राजनीतिक चेतावनी नहीं है, बल्कि समयसीमा समाप्त होते ही उनके कार्यकर्ता सड़कों पर उतरेंगे। जरूरत पड़ने पर राजधानी दिल्ली स्थित निर्वाचन आयोग के मुख्यालय के अनिश्चितकालीन घेराव से लेकर देश के हर छोटे-बड़े शहर, कस्बे, ग्राम पंचायतों, जिला मुख्यालयों और सभी राज्यों की राजधानियों में व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे। इस प्रस्तावित देशव्यापी आंदोलन के जरिए न केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के तत्काल इस्तीफे की मांग की जाएगी, बल्कि चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी बनाने, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में हुई कथित धांधली की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक स्वतंत्र उच्च-स्तरीय न्यायिक जांच करवाने और बिना किसी देरी के पुरानी तथा प्रामाणिक मतदाता सूचियों को तत्काल प्रभाव से बहाल करने की भी पुरजोर मांग सड़क से लेकर संसद के बाहर तक उठाई जाएगी।
अभिजीत दीपके के इस बेहद आक्रामक, रणनीतिक और जोखिम भरे कदम ने न केवल निर्वाचन आयोग को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है, बल्कि देश की समूची चुनाव प्रणाली और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों को फिर से राष्ट्रीय विमर्श के बिल्कुल केंद्र में ला दिया है। उन्होंने अपनी प्रेस वार्ता के दौरान यह भी गंभीर दावा किया कि हाल के राजनीतिक परिदृश्यों में जिन चुनावों में सत्तारूढ़ दल को एकतरफा और अप्रत्याशित जीत मिली है या विपक्ष को अकल्पनीय हार का सामना करना पड़ा है, उसके पीछे जनता का वास्तविक जनादेश नहीं, बल्कि इसी तरह की गहरी, संस्थागत और व्यवस्थागत ‘गड़बड़ियां’ ही मुख्य रूप से जिम्मेदार रही हैं। सीजेपी के इस कड़े तेवर, गंभीर आरोपों और 48 घंटे के अल्टीमेटम के बाद अब देश भर की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों, नागरिक समाज, कानूनी विशेषज्ञों और राष्ट्रीय मीडिया की पूरी नजरें आगामी 48 घंटों की उस महत्वपूर्ण समयसीमा पर टिक गई हैं। अब यह देखना बेहद अहम और दिलचस्प होगा कि एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय होने के नाते निर्वाचन आयोग की तरफ से इन बेहद गंभीर और सीधे आरोपों पर क्या आधिकारिक और तथ्यात्मक प्रतिक्रिया सामने आती है, और क्या अभिजीत दीपके अपने इस अल्टीमेटम को वास्तव में एक असरदार राष्ट्रव्यापी आंदोलन में तब्दील करने में सफल हो पाते हैं।
