पुस्तक न्यास, भारत एवं इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती, संबद्ध अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को ‘लोक से लोकमंथन : लोक साहित्य और लोक कला की समकालीन यात्रा’ विषय पर प्री-लोकमंथन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के वसंत कुंज स्थित सभागार में दोपहर 2 से 4 बजे तक आयोजित इस कार्यक्रम में लोक साहित्य, लोक कला, भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों तथा नई पीढ़ी तक लोक परंपराओं को पहुँचाने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के निदेशक श्री युवराज मलिक, संयुक्त निदेशक श्री कुमार विक्रम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. मलखान सिंह, अदिति महाविद्यालय, दिल्ली की प्राचार्य प्रो. नीलम राठी तथा इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती, दिल्ली के अध्यक्ष डॉ. विनोद बब्बर ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. गणेश श्रीवास्तव ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष पुष्प अर्पित करके किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के निदेशक श्री युवराज मलिक ने अतिथियों को पुस्तकें एवं शॉल भेंटकर उनका स्वागत किया।
इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती, दिल्ली के अध्यक्ष डॉ. विनोद बब्बर ने कहा कि लोक साहित्य ही लोकजीवन है। लोक परंपराएँ मनुष्य को जीवन जीने की दृष्टि प्रदान करती हैं और सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि समकालीन समाज में पारिवारिक संबंधों और सामूहिक जीवनबोध में कमी दिखाई दे रही है। ऐसे समय में लोक परंपराओं से प्रेरणा लेना और सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में धरती को माँ मानने जैसी अवधारणाएँ प्रकृति के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का संदेश देती हैं।
अदिति महाविद्यालय, दिल्ली की प्राचार्य प्रो. नीलम राठी ने लोकमंथन की पृष्ठभूमि और उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस वैचारिक मंच का प्रमुख उद्देश्य युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना तथा उन्हें भारतीय परंपराओं, सांस्कृतिक मूल्यों और मान्यताओं से परिचित कराना है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापक समझ युवाओं तक पहुँचाने और सांस्कृतिक विमर्श में उनकी सहभागिता बढ़ाने के लिए देश के विभिन्न प्रमुख शहरों में लोकमंथन का आयोजन किया जाता रहा है। इसी क्रम में आगामी आयोजन जयपुर में प्रस्तावित है। यह मंच भारतीय परंपराओं को समझने और उनके महत्व पर विचार-विमर्श करने का एक सार्थक प्रयास है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. मलखान सिंह ने कहा कि लोक साहित्य और लोक परंपराएँ समाज को जोड़ने का कार्य करती हैं। व्यक्ति का परिवेश उसकी सोच, ऊर्जा और सृजनशीलता को प्रभावित करता है। इसलिए ऐसा वातावरण आवश्यक है, जो रचनात्मकता, मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रोत्साहित करे। उन्होंने कहा कि आज समाज के सामने एक बड़ी चुनौती अपने मूल्यों और लोककल्याण की भावना से दूर होना है। मानवीय एवं जीवन-मूल्यों की उपेक्षा से अनेक सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
डॉ. सिंह ने कहा कि लोक का अर्थ सामूहिक चेतना है। जहाँ ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ की भावना होती है, वहीं लोक की वास्तविक शक्ति दिखाई देती है। शिक्षा का उद्देश्य भी मनुष्य को सामाजिक और संवेदनशील बनाना होना चाहिए। शास्त्रीय चिंतन जब लोक की कसौटी पर खरा उतरता है और समाज के अनुभवों एवं संवेदनाओं से संवाद करता है, तभी वह लोकजीवन के लिए प्रासंगिक बनता है। लोक साहित्य संवादधर्मी होता है। यह रिश्तों में सरसता लाने के साथ-साथ समाज में नई संभावनाओं के द्वार भी खोलता है।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के निदेशक श्री युवराज मलिक ने कहा कि यह गर्व का विषय है कि लोकमंथन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चिंतन-मनन के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत को चुना गया। भारतीय संस्कृति, लोक कला और लोक साहित्य को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इन्हें समग्रता में समझने के लिए भारत की ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और विभिन्न परंपराओं के अंतर्संबंधों को समझना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि देश और राष्ट्र की अवधारणाओं में अंतर है। राष्ट्र की पहचान केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना, परंपराओं और सामूहिक जीवनबोध से निर्मित होती है। भारतीय ज्ञान परंपरा ने लोक साहित्य और लोक संस्कृति को जोड़ने का कार्य किया है। लोक समाज को वह दृष्टि प्रदान करता है, जो उसे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
कार्यक्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री मनोज कुमार जी का सान्निध्य एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। इस अवसर पर दिल्ली प्रांत के महामंत्री श्री मनोज कुमार शर्मा जी, श्री प्रवीण आर्य जी, श्रीमती पूनम मटिया, श्री संजीव सिन्हा, डॉ. अग्निवेश, श्री मुन्ना रजक, श्रीमती सारिका कालरा जी, श्रीमती ममता जी, श्रीमती रजनी जी एवं श्री जगदीश जी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की। बीडब्ल्यूएस के श्री संजय भाई जी अपनी टीम के साथ कार्यक्रम में सम्मिलित हुए।कार्यक्रम के अंत में श्री प्रशांत सिंह जी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने लोक साहित्य और लोक कला को भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, सामूहिक चेतना तथा ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए इनके संरक्षण एवं संवर्धन पर बल दिया। उन्होंने मातृभाषाओं को प्रोत्साहित करने, युवाओं को भारतीय परंपराओं से जोड़ने तथा लोकजीवन के मूल्यों को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह प्री-लोकमंथन कार्यक्रम भारतीय लोक परंपराओं के समकालीन महत्व को समझने तथा उनके संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में सार्थक संवाद का महत्वपूर्ण अवसर बना।
