आदित्य शुक्ला
कॉकरोच जनता पार्टी’ के विवादों में घिरे शीर्ष नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की ज़मानत का इंतज़ार कर रहे उनके समर्थकों को उस समय करारा झटका लगा, जब रविवार को निर्धारित समय पर सुनवाई शुरू ही नहीं हो सकी। मामले की सुनवाई करने वाले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट तय वक्त पर अदालत नहीं पहुँचे, जिससे वहाँ भारी असमंजस और सन्नाटा पसर गया। शुरुआत में लोगों को लगा कि शायद किसी मामूली प्रशासनिक देरी या कागजी कमी के कारण कार्यवाही रुकी है, लेकिन कुछ ही देर में इस पूरे मामले से पर्दा उठा और सामने आया कि इसके पीछे एक बेहद गंभीर और खौफनाक वजह छिपी हुई है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है।
मामले की तह में जाने पर पता चला कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अपनी जान को सीधे तौर पर खतरा बताते हुए इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई से खुद को पूरी तरह और हमेशा के लिए अलग कर लिया है। मजिस्ट्रेट ने अपने उच्चाधिकारियों को सूचित किया कि मौजूदा माहौल में उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ चुकी है और वे किसी भी प्रकार के भय, दबाव या जान जोखिम में डाले बिना न्यायिक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर सकते। न्याय की कुर्सी पर बैठकर निष्पक्ष फैसला सुनाने वाले एक जिम्मेदार अधिकारी का इस तरह से खुद को बचाते हुए केस से अलग होना इस बात की गवाही देता है कि पर्दे के पीछे कुछ बहुत खतरनाक और असामाजिक गतिविधियां चल रही थीं।
इस घटना के सामने आते ही दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों में तुरंत खलबली मच गई, जिसके बाद पुलिस महकमे ने बिना किसी विलंब के इस गंभीर धमकी के संबंध में औपचारिक रूप से मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस सूत्रों और शुरुआती तफ्तीश से जो डरावनी बातें सामने आई हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं; उनके मुताबिक SEM पर लगातार यह दबाव बनाया जा रहा था कि वे नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर सौरव दास और आशुतोष रांका को बिना किसी देरी के तुरंत और फौरी तौर पर रिहा कर दें। जब मजिस्ट्रेट ने किसी भी गैर-कानूनी दबाव में झुकने से साफ इनकार कर दिया, तो उन्हें अपनी जान से हाथ धोने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियाँ मिलने लगीं, जिसके चलते उन्हें यह कड़ा कदम उठाना पड़ा।
पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अब इस धमकी भरे मामलों की कड़ियों को आपस में जोड़ने में जुट गए हैं और यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि पर्दे के पीछे कौन लोग थे जिन्होंने न्यायपालिका और मजिस्ट्रेट को डराने की यह हिमाकत की। इसके साथ ही, सुरक्षा के मद्देनजर संबंधित मजिस्ट्रेट के आवास और कार्यस्थल के आसपास सुरक्षा घेरे को बेहद सख्त कर दिया गया है ताकि किसी भी अनहोनी या खतरे को पूरी तरह टाला जा सके। दूसरी तरफ, कानूनी जानकारों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम और धमकी भरे प्रकरण के कारण अब सीजेपी नेताओं के वकीलों के लिए भी आगे की कानूनी राह बेहद कठिन और जटिल हो गई है, क्योंकि कोई भी नया अधिकारी इस मामले में अत्यधिक सतर्कता बरतेगा।
अब जबकि पुराने मजिस्ट्रेट ने इस मामले से पूरी तरह किनारा कर लिया है और ज़मानत याचिका की सुनवाई अधर में लटक गई है, तो सौरव दास और आशुतोष रांका को फिलहाल अपनी रिहाई के लिए अनिश्चितकाल तक जेल की चारदीवारी में ही वक्त बिताना होगा। प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत अब इस फाइल को किसी अन्य नए विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सुपुर्द करने की कागजी कार्रवाई शुरू की जाएगी, जिसके बाद नया मजिस्ट्रेट पूरे मामले का बारीकी से अध्ययन करेगा। इस पूरी लंबी प्रक्रिया के पूरी होने के बाद ही यह तय हो पाएगा कि इन दोनों नेताओं की ज़मानत अर्जी पर दोबारा सुनवाई कब और किस तारीख को शुरू होगी, जिससे उनकी मुश्किलें फिलहाल काफी बढ़ती हुई नजर आ रही हैं।
