डॉ सत्य प्रकाश तिवारी
वाराणसी: काशी की धरती पर जब गंगा की लहरें और मंदिरों की घंटियाँ शांत होती हैं, तब संकट मोचन मंदिर के प्रांगण से शास्त्रीय संगीत की एक ऐसी धारा फूटती है जो पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध कर देती है। 1923 में एक छोटे से अंकुर के रूप में शुरू हुआ ‘संकट मोचन संगीत समारोह’ आज अपने 103वें वर्ष में एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। यह मात्र एक संगीत सभा नहीं, बल्कि साक्षात ‘हनुमत आराधना’ है, जहाँ कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन नहीं, बल्कि ईश्वर के चरणों में अपनी श्रद्धा की ‘हाजिरी’ लगाते हैं। अभाव के दौर से शुरू होकर आज एआई (AI) और सोशल मीडिया के दौर तक इस समारोह ने न केवल अपनी निरंतरता बनाए रखी है, बल्कि हर युग के साथ खुद को और अधिक समृद्ध और समावेशी बनाया है।
इस शताब्दी से भी लंबी यात्रा में समारोह ने कई क्रांतिकारी बदलाव देखे हैं। 1923 से लेकर अगले 40 वर्षों तक यह आयोजन महज एक दिन का होता था, लेकिन संगीत के प्रति बढ़ती दीवानगी और कलाकारों के समर्पण ने इसे आज छह दिवसीय भव्य उत्सव में बदल दिया है। वर्तमान महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र बताते हैं कि कलाकारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि सात दिन भी कम पड़ जाते हैं। इस मंच का इतिहास सामाजिक बदलावों का भी साक्षी रहा है। 1978 तक यहाँ केवल पुरुष कलाकारों का वर्चस्व था, जिसे महंत वीरभद्र मिश्र ने कंकना बनर्जी को मंच प्रदान कर तोड़ा। तब से महिलाओं की भागीदारी इस उत्सव का अटूट हिस्सा बन गई। इसके साथ ही, 1987 में उमा शर्मा और पंडित बिरजू महाराज जैसे दिग्गजों ने यहाँ नृत्य की शास्त्रीय गरिमा को स्थापित किया, जिससे यह मंच गायन, वादन और नृत्य का त्रिवेणी संगम बन गया।
यह समारोह भारतीय संस्कृति की साझी विरासत और सांप्रदायिक सौहार्द की भी एक अनुपम मिसाल है। जहाँ एक ओर यहाँ ‘हनुमत मत’ की गूँज है, वहीं दूसरी ओर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां और मुमताज अहमद जैसे मुस्लिम कलाकारों की शहनाई ने इस प्रांगण को पवित्रता प्रदान की है। समारोह का मंच भी समय के साथ अपना स्थान बदलता रहा—मंदिर की ड्योढ़ी से शुरू होकर कुएं की जगत और फिर वर्तमान बरामदे तक का यह सफर इस आयोजन की जीवंतता को दर्शाता है। संगीत के प्रति ऐसी अटूट निष्ठा है कि पद्मविभूषण पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जैसे वयोवृद्ध साधक आज भी संकल्प लेते हैं कि जब तक शरीर में प्राण हैं, वे बाबा के दरबार में अपनी बांसुरी की तान छेड़ते रहेंगे।
आज जब दुनिया इंटरनेट और इंस्टाग्राम के जरिए इस समारोह का आनंद ले रही है, तब भी इसकी मूल आत्मा वही ‘भक्ति’ है जो 1923 में थी। पंडित राजेश्वराचार्य जैसे विद्वान, जो पिछले 76 वर्षों से इस रसधारा में भीग रहे हैं, इसे विश्व के शीर्षतम संगीत समारोहों में शुमार करते हैं। संकट मोचन संगीत समारोह आज न केवल शास्त्रीय संगीत को जीवित रखे हुए है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को यह भी सिखा रहा है कि कैसे परंपराएं समय के साथ कदम मिलाकर चलती हैं और अपनी जड़ों से जुड़ी रहती हैं।
