मातृत्व, संस्कार और संस्कृति का अनुपम उत्सव: भावनाओं से सराबोर रहा ‘मां तेरे लिए ’ का सांस्कृतिक सत्र
‘शिव तांडव’ ने अपनी ऊर्जा, ओज, लय और आध्यात्मिक प्रभाव से पूरे सभागार को शिवमय बना
प्रणव कुमार अभय, गोपालगंज
कृष्णलता फाउंडेशन एवं ओशनिक माइंड स्कूल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘मां तेरे लिए… संस्कार महोत्सव’ के सांस्कृतिक सत्र इसी भावभूमि पर एक अविस्मरणीय उत्सव बन गया. कार्यक्रम के एक अत्यंत भावुक क्षण में ओशनिक माइंड स्कूल के संस्थापक दिग्विजय नारायण सिंह ने अपनी स्वरांजलि के रूप में भोजपुरी गीत “अमृत के धार केहू केतनो पियाई, एगो माई बिना, कइसे करेजवा जुड़ाई ए भाई, एगो माई बिना…”प्रस्तुत किया. गीत की मार्मिकता और भावनात्मक अभिव्यक्ति ने उपस्थित जनसमुदाय को भाव-विभोर कर दिया तथा पूरा सभागार तालियों और भावनाओं से गूंज उठा. जब मंच पर मातृत्व की महिमा गूंज रही थी, बच्चों की निष्कलुष अभिव्यक्तियां संस्कारों का संदेश दे रही थीं और पूरा सभागार भक्ति, श्रद्धा तथा भावनाओं के रंग में रंगा हुआ था, तब ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भारतीय संस्कृति स्वयं सजीव होकर उपस्थित हो गई हो. सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की श्रृंखला में विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत ‘ले जाओ दौलत, मैं मां रख लेता हूं’ गीत ने मातृ प्रेम की अमूल्य गरिमा को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया. वहीं नन्हे-मुन्ने बच्चों की प्रस्तुति ‘मां के अनेक रूप’ ने त्याग, वात्सल्य, ममता और समर्पण की ऐसी जीवंत तस्वीर प्रस्तुत की कि अनेक दर्शकों की आंखें नम हो गईं. कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण ‘समुद्र मंथन : विषपान’ नाट्य प्रस्तुति रही. भगवान शिव द्वारा लोक कल्याण के लिए विषपान के दिव्य प्रसंग को विद्यार्थियों ने अत्यंत प्रभावशाली एवं जीवंत शैली में प्रस्तुत किया. इसके पश्चात प्रस्तुत ‘शिव तांडव’ ने अपनी ऊर्जा, ओज, लय और आध्यात्मिक प्रभाव से पूरे सभागार को शिवमय बना दिया. प्रस्तुति समाप्त होने पर देर तक तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही.

नाट्य प्रस्तुतियों ने मानवीय संवेदनाओं को उकेरा

‘मां : द लाइट ऑफ लाइफ’, ‘मदर्स लव द मैजिक ब्लैंकेट’ तथा ‘आइना समाज का’ जैसी नाट्य प्रस्तुतियों ने मातृत्व, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से मंचित किया. इन प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि संस्कार ही किसी भी सभ्य समाज और सशक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं. कार्यक्रम में आद्या नारायण सिंह द्वारा प्रस्तुत ‘ऐसी होती है मां’ ने मातृत्व की महानता को भावपूर्ण स्वर प्रदान किया, जबकि शाम्भवी सिंह की प्रेरक प्रस्तुति ‘डगर है मुश्किल’ ने संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास का संदेश देकर युवाओं को प्रेरित किया. रव्यांश चौबे एवं प्रतीक श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत कविताओं ने भी अपनी संवेदनशील अभिव्यक्ति और प्रभावशाली प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया. ‘कौन सा मंत्र जपूं मैं’, ‘चंदा रे’ तथा ‘बुरे काम का बुरा नतीजा’ जैसी प्रस्तुतियों ने मनोरंजन के साथ-साथ नैतिक शिक्षा और जीवन मूल्यों का भी प्रभावी संदेश दिया. बच्चों की सहज अभिनय क्षमता और आत्मविश्वास ने सभी का मन मोह लिया.
अमृत के धार केहू केतनो पियाई, एगो माई बिना…

सांस्कृतिक संध्या के दौरान प्रस्तुत ‘मां-बाप से बढ़कर जग में’, ‘सांसों की माला पे’, ‘राम के गुणगान कीजिए’, ‘जग में माई बिना केहू’, ‘मन से बड़ा बहुरूपिया न कोई’ तथा ‘जब आंख खुली तब’ जैसे गीतों ने पूरे वातावरण को भक्ति, श्रद्धा, कृतज्ञता और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से सराबोर कर दिया. इस अवसर पर बलिराम सिंह,अरविन्द सिंह, नीलेश त्रिपाठी, डॉ. मिथिलेश सिंह, प्रो. शारदिंदु तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर कुमार मिश्रा, संगीता तिवारी, अनिल सिंह तथा डॉ. पीके मिश्रा, युवा चिप वैज्ञानिक मदनजीत कुमार सिंह, राजीव सिंह राजपूत मौजूद थे.
