प्रेम कुमार
नई दिल्ली, 27 जून। आपातकाल से पहले बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का श्रीगणेश करने वाले राम बहादुर राय ने कहा है कि इंदिरा गांधी ने जय प्रकाश नारायण के सेना को सरकार का आदेश न मानने की सलाह के कारण नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी ने अपनी प्रधानमंत्री पद की कुर्सी बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोंपा था ।
वह राष्ट्रीय कला केंद्र में लेखक अजय सेतिया की नवीनतम पुस्तक आपातकाल : ” आंदोलन और विश्वासघात की अंतर्कथा” के विमोचन और आपातकाल के सबक विषय पर चर्चा में बोल रहे थे । कार्यक्रम में आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने वाले इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय, श्री के. एन गोविंदाचार्य , श्री राज कुमार भाटिया मुख्य वक्ता थे । यहां उल्लेखनीय यह है पुस्तक लेखक अजय सेतिया और अन्य तीनों भी आपातकाल में जेल में रहे थे ।
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा कि 25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल देश की आंतरिक सुरक्षा के कारण नहीं, बल्कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के खिलाफ आए फैसले और सुप्रीम कोर्ट के अर्धनारीश्वर जैसे फैसले के कारण लगाया गया था, जिसमें वह लोकसभा की सदस्य तो नहीं रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले तक प्रधानमंत्री पद पर रह सकती थी । इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल लगा विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और संविधान संशोधन कर के उन कानूनों को ही बदल दिया, जिनके कारण हांईकोर्ट का फैसला उनके खिलाफ आया था । इसलिए आपातकाल सिर्फ और सिर्फ अपनी सत्ता बचाने के लिए लिया गया राजनीतिक निर्णय था। उन्होंने कहा कि उस समय जिन परिस्थितियों का हवाला देकर आपातकाल लगाया गया, वे वास्तविकता से परे थीं। रेलवे कर्मचारियों का आंदोलन समाप्ति की ओर था और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन भी उस स्तर पर नहीं था कि उससे देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता ।
इससे पहले अजय सेतिया ने कहा कि सिद्धार्थ शंकर रे ने शाह आयोग के सामने कबूल किया था कि आपातकाल का फैसला जय प्रकाश नारायण के भाषण से पहले लिया जा चुका था । अजय सेतिया ने कहा कि इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति के सामने झूठ बोला था, राष्ट्रपति इतने दब्बू निकले कि इंदिरा गांधी का एपीएस आरके धवन रात ग्यारह बजे प्रधानमंत्री आवास में टाईप किए गए आपातकाल के आदेश पर दस्तखत करवा लाया था । उन्होंने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे कठिन दौर था। उन्होंने बताया कि पुस्तक में आपातकाल के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के सत्याग्रह और भूमिगत आंदोलन पर विस्तार से चर्चा की गई है, जबकि अब तक प्रकाशित अन्य पुस्तकों में इन दिनों संगठनों की अनदेखी की गई थी । किताब में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले अनेक व्यक्तियों की भूमिका को ऐतिहासिक संदर्भों और तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया गया है। सेतिया ने कहा कि इस पुस्तक में कई ऐसे दस्तावेज और तथ्य शामिल किए गए हैं, जो पहले व्यापक रूप से सामने नहीं आए थे।
डॉ. राजकुमार भाटिया ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे नई पीढ़ी तक तथ्यात्मक रूप में पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए इतिहास से सीख लेना समय की आवश्यकता है। लोकतंत्र की रक्षा केवल संवैधानिक व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी होती है।आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर लगे प्रतिबंधों को स्मरण करते हुए उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाए रखने का आह्वान किया।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के खचाखच भरे हाल में बड़ी संख्या में पत्रकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं बुद्धिजीवियों ने भाग लिया और आपातकाल से जुड़े ऐतिहासिक अनुभवों तथा लोकतंत्र की चुनौतियों पर गंभीर विमर्श किया।
