. भारत के साहित्य व विचार की यात्रा है साहित्य परिक्रमा – डा पवनपुत्र बादल

• झूठा सच कृति पर नाट्य मंचन से व्यक्त हुआ विभाजन का दर्द

प्रणव कुमार / नितिन गुप्ता

सरस्वती वंदना एवं साहित्य भारती के उद्देश्य गीत लोकमंगल की कामना के गायन से शुभारम्भ कार्यक्रम में इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती, दिल्ली प्रांत के दायित्व नियुक्तियों के साथ साहित्य परिक्रमा के नूतन कलेवर का विमोचन व विभाजन विभीषिका विषयक नाट्य मंचन हुआ।

दायित्व घोषणाएं

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष डॉ सुशीलचन्द्र द्वारा दिल्ली प्रान्त की कार्यसमिति की अधिकारिक घोषणा की गई जिसमें रामशरण गौड़ को संरक्षक, विनोद बब्बर को अध्यक्ष, पूनम माटिया को उपाध्यक्ष, मनोज शर्मा को महामंत्री, मुन्ना रजक को कोषाध्यक्ष , ममता वालिया को साहित्यिक पत्रिका प्रमुख, मलखान सिंह को लोक साहित्य, राकेश कुमार को बाल साहित्य, सारिका कालरा को युवा कार्य, दिनेश वत्स को प्रचार प्रमुख और जगदीश सिंह एवं सुनीता बुग्गा को सदस्य का दायित्व सौंपा गया है।

इस अवसर पर डॉ सुशीलचंद्र ने कहा कि हम सब मिलकर एक मन से संपूर्ण साहित्य जगत में पहुँच बनाते हुए साहित्य के माध्यम से भारतीय चेतना को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाने का कार्य करें जिससे साहित्य के सर्वहित का संदेश संपूर्ण विश्व तक पहुंच सके, ऐसा पाथेय प्रदान करते हुए दायित्वबोध कराया । साथ ही, दिल्ली राज्य में दस केन्द्रों पर मासिक साहित्य गतिविधि के सुचारू संचालन के लिए संयोजक ,सहसंयोजक एवं कार्यालय टोली की घोषणा प्रांत अध्यक्ष डॉ विनोद बब्बर ने की। उन्होंने घोषणाओं के पश्चात शुभकामनाएं देते हुए साहित्य और समाज सेवा के प्रति समर्पित रहने का आह्वान किया।

           विमोचन

इस अवसर पर साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य परिक्रमा’ के नवीन कलेवर का विमोचन हुआ। प्रबन्ध संपादक डॉ रजनी ने साहित्य परिक्रमा का परिचय देते हुए बताया कि पत्रिका अब ग्वालियर के बजाय दिल्ली से प्रकाशित होने के साथ उसका कलेवर भी परिवर्तित हुआ है। ‘साहित्य परिक्रमा’ पत्रिका के कुछ पूर्ववर्ती स्तंभों को नए नाम और नए स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है। पृष्ठ संख्या वृद्धि के साथ विषयवस्तु को अधिक विविध, समृद्ध और समकालीन बनाने के लिए इनमें ‘कलालोक’ और ‘लोकालोक’ व भाषा सुभाषा’ आदि स्तंभ प्रारंभ किए गए हैं।

‘साहित्य परिक्रमा’ के इस नवीन अंक में ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और राष्ट्रीय संदर्भों को सामने लाने का प्रयास किया गया है।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के महामंत्री पवनपुत्र बादल ने कहा कि परिक्रमा का यह कलेवर हमारी परंपरा को आधुनिक संदर्भों के साथ जोड़कर युवाओं को नई दृष्टि प्रदान करेगा। साहित्य परिक्रमा की मूल दृष्टि में भारत की सभी भाषाएं- राष्ट्रभाषाएं और सभी का सम्मान हमारा कर्तव्य है। ‘साहित्य परिक्रमा’ हिंदी में प्रकाशित होने के बावजूद उसकी दृष्टि सभी भारतीय भाषाओं तक है। इसी भावना से पत्रिका में एक नया स्तंभ ‘भाषा सुभाषा’ प्रारंभ किया गया है। इस स्तंभ के अंतर्गत हिंदी के अतिरिक्त भारतीय भाषा उसी भाषा की मूल लिपि के साथ प्रकाशित की जाएगी। इस अभिनव पहल का शुभारंभ तमिल भाषा से किया गया है।

        नाट्य मंचन

1947 स्मृतियों के झरोखे से—विभाजन की विभीषिका’ का भावपूर्ण नाट्य मंचन

साहित्यकार यशपाल की कृति झूठा सच पर आधारित विभाजन विभीषिका’ विषय पर भावपूर्ण नाट्य मंचन का आयोजन मेघदूत थिएटर परिसर में अदिति महाविद्यालय की छात्राओं द्वारा किया गया।

 

नाटक के माध्यम से भारत विभाजन की त्रासदी को संवेदनाओं और स्मृतियों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। विभाजन केवल भौगोलिक सीमा का विभाजन मात्र नहीं था बल्कि उसने असंख्य परिवारों को एक-दूसरे से अलग कर उनको गहरा आघात पहुँचाया।

नाट्य प्रस्तुति में हिन्दू परिवारों की पीड़ा को सामने लाया गया, जिन्हें अपना घर, अपनी गली, अपना गाँव, अपनी मिट्टी और अपने प्रियजनों को छोड़कर अनजान स्थानों की शरण में जाना पड़ा।प्रस्तुति का सबसे मार्मिक पक्ष यह रहा कि विस्थापन के बावजूद अपनी जन्मभूमि से जुड़ी भावनाएं और स्मृतियां उनके हृदय में अमिट बनी हुई है।

साहित्य परिषद के अखिल भारतीय पदाधिकारी सहित साहित्य एवं संस्कृति जगत से जुड़े अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।

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