संवाददाता नईं दिल्ली
देशभर में इन दिनों मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण का व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में घर-घर जाकर सत्यापन प्रक्रिया को पूरा कर रहे बूथ लेवल अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले चुनाव आयोग के आधिकारिक ऐप में एक बेहद संवेदनशील और विवादित बदलाव देखने को मिला है। बीएलओ के ऐप इंटरफेस में ‘मार्क वीआईपी’ नाम का एक नया विकल्प जोड़ा गया है, जिसने प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस फीचर के सामने आते ही यह आरोप लगने लगे हैं कि चुनाव आयोग आम मतदाताओं की रोजमर्रा की तकनीकी परेशानियों, कतारों और जटिल प्रक्रियाओं की अनदेखी कर रहा है। लोगों का कहना है कि जब लोकतंत्र में संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, तो सिस्टम में कुछ खास लोगों को अलग से ‘वीआईपी’ के रूप में चिन्हित करके उनकी सहूलियत के लिए विशेष व्यवस्था क्यों बनाई जा रही है, जबकि आम वोटर छोटे-छोटे सुधारों के लिए भी चक्कर काटने को मजबूर हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प और हैरान करने वाला तकनीकी पहलू यह सामने आया है कि यह नया फीचर सभी बीएलओ के मोबाइल में एक समान रूप से दिखाई नहीं दे रहा है। यह ‘मार्क वीआईपी’ विकल्प सामान्य एंड्राइड स्मार्टफोन में शो नहीं हो रहा है, बल्कि इसे विशेष रूप से केवल एप्पल के आईफोन में इस्तेमाल होने वाले ऐप वर्जन में ही देखा जा रहा है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, इस नए अपडेट को 31 जुलाई को ऐप में शामिल किया गया था। आईफोन में इस तरह का विशेष विकल्प दिखने के बाद से यह सवाल और भी गहराने लगा है कि आखिर वीआईपी वोटरों की अलग से पहचान करने और उनकी समस्याओं का त्वरित निपटारा करने के लिए यह अलग से तकनीकी व्यवस्था क्यों की गई? आम जनता और विश्लेषकों का तर्क है कि जब आम वोटर अपने मतदाता पहचान पत्र में नाम, पता या फोटो दुरुस्त कराने के लिए हफ्तों संघर्ष करते हैं, तब चुनिंदा वर्ग के लिए इस तरह की विशेष सुविधा लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़े करती है।
इस विवाद के तूल पकड़ने और लगातार उठ रहे सवालों के बीच आखिरकार चुनाव आयोग ने सामने आकर अपनी औपचारिक सफाई पेश की है। आयोग ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया है कि यह फीचर वीआईपी वोटरों को कोई अनुचित लाभ, अलग प्राथमिकता या आम नागरिकों से अलग तरजीह देने के लिए बनाया गया है। अपनी सफाई में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि 24 जून, 2025 को बिहार में एसआईआर प्रक्रिया को सुचारू रूप से शुरू करने के लिए एक विशेष दिशानिर्देश और सर्कुलर जारी किया गया था। आयोग के अनुसार, यह फीचर पूरी तरह से एक तकनीकी और प्रशासनिक जरूरत है, जिसका उद्देश्य डेटाबेस के प्रबंधन को अधिक सुव्यवस्थित, त्रुटिहीन और पारदर्शी बनाना है, न कि किसी वर्ग को विशेष दर्जा देना।
चुनाव आयोग द्वारा जारी स्पष्टीकरण में आगे बताया गया है कि इस ‘मार्क वीआईपी’ फीचर का मुख्य मकसद उन प्रमुख हस्तियों का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखना है, जो समाज में महत्वपूर्ण और संवैधानिक भूमिका निभाते हैं। इस श्रेणी में न्यायपालिका के माननीय सदस्य, निर्वाचित जन प्रतिनिधि, विभिन्न घोषित व संवैधानिक पदों पर आसीन अधिकारी, तथा कला, साहित्य, संस्कृति, खेल, पत्रकारिता और जनसेवा जैसे क्षेत्रों से जुड़े देश के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व शामिल हैं। आयोग का कहना है कि इन हस्तियों के नाम मतदाता डेटाबेस में पहले से ही विशेष रूप से चिन्हित थे। इस नए फीचर का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि ड्राफ्ट यानी मसौदा मतदाता सूची तैयार करते समय इनका नाम किसी तकनीकी चूक के कारण छूट न जाए और दावे तथा आपत्तियों की निर्धारित समय-सीमा के दौरान इनके सत्यापन से जुड़े सभी आवश्यक दस्तावेज समय पर एकत्र किए जा सकें, जिससे अंतिम मतदाता सूची पूरी तरह सटीक प्रकाशित हो सके।
