संवाददाता, राजस्थान
राजस्थान के प्रशासनिक और शैक्षणिक इतिहास में एक अप्रत्याशित और गंभीर घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राज्य की पूरी शिक्षा व्यवस्था और मीडिया जगत के बीच एक बड़ा टकराव पैदा कर दिया है। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय, बीकानेर की ओर से जारी एक बेहद सख्त आदेश के तहत प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में पत्रकारों, कैमरामैन और बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है।
इस पूरे मामले में प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल इसलिए उठ रहे है क्योंकि इतना संवेदनशील और बड़ा फैसला किसी आधिकारिक कार्यदिवस के बजाय रविवार की छुट्टी के दिन आनन-फानन में जारी किया गया। माध्यमिक शिक्षा निदेशक ललित कुमार के हस्ताक्षरित इस आधिकारिक आदेश पत्र के प्रभावी होते ही अब राजस्थान के किसी भी प्राथमिक, उच्च प्राथमिक या माध्यमिक सरकारी विद्यालय परिसर में मीडियाकर्मियों के फोटो खींचने, वीडियो रिकॉर्डिंग करने, शिक्षकों, कर्मचारियों या छात्र-छात्राओं का साक्षात्कार (इंटरव्यू) लेने और किसी भी प्रकार की लाइव स्ट्रीमिंग करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि बिना पूर्व लिखित प्रशासनिक अनुमति के यदि कोई भी बाहरी व्यक्ति या मीडिया प्रतिनिधि स्कूल की सीमा में प्रवेश करता है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
इस कड़े फरमान को लेकर राज्य के शिक्षा विभाग और प्रशासनिक आलाधिकारियों की अपनी अलग दलीलें और तर्क हैं। शासन की ओर से इस निर्णय को पूरी तरह से विद्यार्थियों के हित, सुरक्षा और शैक्षणिक माहौल को बेहतर बनाने की दिशा में उठाया गया एक सुधारात्मक कदम बताया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि पठन-पाठन के अमूल्य समय के दौरान कैमरों, माइक और मीडिया प्रतिनिधियों की बेरोक-टोक आवाजाही से कक्षाओं का अनुशासन भंग होता है और बच्चों का ध्यान पढ़ाई से पूरी तरह भटक जाता है। इसके अलावा, हाल के दिनों में नाबालिग छात्र-छात्राओं की गोपनीयता (प्राइवेसी), उनकी सुरक्षा और सोशल मीडिया पर बिना सहमति के उनके वीडियो वायरल होने जैसी कई संवेदनशील शिकायतें विभाग तक पहुंची थीं। प्रशासनिक पक्ष का मानना है कि सरकारी विद्यालयों को बाहरी व्यवधानों से पूरी तरह मुक्त रखना आवश्यक है ताकि शिक्षक बिना किसी दबाव या हिचकिचाहट के केवल पढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर सकें और बच्चे एक सुरक्षित, भयमुक्त व शांत वातावरण में शिक्षा ग्रहण कर सकें।
दूसरी तरफ, रविवार के दिन लागू किए गए इस प्रशासनिक फरमान के सार्वजनिक होते ही पूरे प्रदेश में विरोध और आक्रोश की एक प्रचंड लहर दौड़ गई है। राज्य के विभिन्न पत्रकार संगठनों, मीडिया यूनियनों, नागरिक समाज संस्थाओं, शिक्षक संघों और विपक्षी दलों ने इस फैसले को लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान द्वारा दी गई प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा व तीखा हमला करार दिया है।
आलोचकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में मीडिया की उपस्थिति हमेशा से एक निष्पक्ष और सजग प्रहरी (वॉचडॉग) की भूमिका निभाती रही है। यह मीडिया की जमीनी रिपोर्टिंग का ही असर होता है कि मिड-डे मील में दी जाने वाली भोजन सामग्री की घटिया गुणवत्ता, स्कूलों की ढहती छतें और जर्जर दीवारें, पीने के पानी का अभाव, गंदे और बदबूदार शौचालय, पुस्तकों व पोषाहार का समय पर न मिलना और शिक्षकों की गैर-हाजिरी जैसे गंभीर मामले शासन-प्रशासन के संज्ञान में आ पाते थे। ऐसे में मीडिया के प्रवेश पर पूरी तरह से ताला लगा देने से इन बुनियादी खामियों और भ्रष्टाचार के मामलों के हमेशा के लिए दब जाने की प्रबल आशंका पैदा हो गई है।
अब यह पूरा घटनाक्रम महज एक प्रशासनिक सर्कुलर न रहकर प्रेस की स्वतंत्रता, जन-अधिकारों और सरकारी तंत्र में पारदर्शिता बनाम अनुशासन की एक बहुत बड़ी वैचारिक और कानूनी लड़ाई का रूप लेता जा रहा है। एक तरफ जहां शिक्षा विभाग इसे अनुशासन और बाल-सुरक्षा के नाम पर पूरी तरह से जायज ठहराने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ राज्यभर के मीडिया संगठनों ने एकजुट होकर इस आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस लेने की चेतावनी दी है। कई पत्रकार यूनियनों ने इस फरमान को ‘काला कानून’ और ‘तुगलकी फैसला’ बताते हुए चरणबद्ध आंदोलन, जिला स्तरीय विरोध-प्रदर्शन और आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की बात की गई है। इस अभूतपूर्व टकराव ने आज राजस्थान के जनमानस में एक यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या बंद दरवाजों के पीछे, बिना किसी सार्वजनिक और मीडिया निगरानी के सरकारी शिक्षा का ढांचा वाकई मजबूत हो पाएगा, या फिर यह पूरी कवायद प्रशासनिक तंत्र द्वारा अपनी कमियों पर पर्दा डालने का प्रयास है?
