प्रणव कुमार दुबे
नई दिल्ली: भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के जनपद संपदा प्रभाग ने अपनी ज्ञानपथ श्रृंखला के तहत ‘बाघा जतिन और बंगाल के प्रारंभिक क्रांतिकारियों का पुनरावलोकन (1890-1915)’ विषय पर एक पुस्तक विमोचन और चर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में प्राइमस बुक्स द्वारा प्रकाशित प्रो. अमिताव चटर्जी की पुस्तक का विमोचन किया गया। इसमें प्रख्यात विद्वानों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने बंगाल के प्रारंभिक राष्ट्रवादी आंदोलन के क्रांतिकारी इतिहास, विचारों और योगदान पर चर्चा की।
भारत सरकार के प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य श्री संजीव सान्याल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि IGNCA के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने सत्र की अध्यक्षता की। कमल संदेश के संपादक डॉ. शिव शक्ति बख्शी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। चर्चा में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत NCPSL के पूर्व निदेशक और दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा एवं साहित्य अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी और प्रख्यात लेखक एवं स्तंभकार श्री चंद्रचूड़ घोष पैनलिस्ट के रूप में शामिल हुए। IGNCA के जनपद संपदा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने स्वागत भाषण दिया।
श्री संजीव सान्याल ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर पर चर्चा करते हुए कहा कि क्रांतिकारी आंदोलन को केवल घटनाओं के क्रम के रूप में नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना चाहिए। उन्होंने बाघा जतिन और उनके साथियों के साहस, संगठन क्षमता और देश के लिए दिए गए बलिदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बाघा जतिन का योगदान एक महत्वपूर्ण आंदोलन का हिस्सा था। स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत से ही सशस्त्र आंदोलन रहा है, लेकिन इसे लेकर एक हिचक रही है और दुर्भाग्य से इसे इतिहास में उतना स्थान नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। उन्होंने कहा कि बाघा जतिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र विद्रोह के जनक थे।
उन्होंने बाघा जतिन की संगठन क्षमता और देश-विदेश के नेटवर्क से उनके जुड़ाव पर जोर दिया। बाघा जतिन को एक गंभीर वैश्विक आंदोलन के संदर्भ में रखते हुए श्री सान्याल ने कहा कि उनकी भूमिका केवल एक क्षणिक घटना नहीं थी, बल्कि एक व्यापक और महत्वपूर्ण क्रांतिकारी धारा का हिस्सा थी।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि इतिहास के ऐसे अध्यायों को सामने लाने से भारत की सांस्कृतिक स्मृति समृद्ध होती है। पुस्तक में दिए गए संदर्भों का उल्लेख करते हुए डॉ. जोशी ने लेखक के प्रयासों की सराहना की और कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और गूगल पर आधारित ज्ञान के इस युग में यह एक अत्यंत प्रासंगिक कृति है। उन्होंने इतिहास को फिर से देखने और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन पर दृष्टिकोण को नए सिरे से तय करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने बाघा जतिन और प्रारंभिक क्रांतिकारियों के योगदान को युवा पीढ़ी तक ले जाने और इतिहास को व्यापक दृष्टिकोण से समझने के महत्व पर भी बल दिया।
डॉ. शिव शक्ति बख्शी ने पुस्तक के ऐतिहासिक महत्व पर बात की और कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के कई अध्यायों पर निरंतर और गंभीर अध्ययन व चर्चा की आवश्यकता है। उन्होंने बाघा जतिन के नेतृत्व और क्रांतिकारी चेतना को भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण धारा बताया।
उन्होंने कहा कि इतिहास लेखन में कुछ हिस्सों की जानबूझकर उपेक्षा की गई है और दर्शकों से स्वतंत्रता के बाद भारत में इतिहास लेखन के संदर्भ पर विचार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ये केवल सशस्त्र क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि विचारक और लेखक भी थे, जिन्होंने जनमानस में चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने शिक्षा जगत से ऐसे और अधिक शोध और लेखन करने का आग्रह किया।
प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी ने बाघा जतिन के प्रारंभिक बचपन से जुड़े अध्याय पर जोर दिया और व्यक्ति के निर्माण में शारीरिक संस्कृति की भूमिका पर विचार किया। अभिमन्यु का उदाहरण देते हुए, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने माँ के गर्भ में ही युद्ध कला सीख ली थी, उन्होंने शारीरिक प्रशिक्षण और तैयारी को परंपरागत रूप से दिए जाने वाले महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने छत्रपति शिवाजी और माता जीजाबाई का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे भारत के सभ्यतागत मूल्य, परवरिश और सामाजिक परिवेश व्यक्ति के चरित्र निर्माण में योगदान देते हैं। मैकाले शिक्षा प्रणाली और वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर चर्चा करते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए।
श्री चंद्रचूड़ घोष ने बाघा जतिन और बंगाल के क्रांतिकारी इतिहास से जुड़े कई पहलुओं को सामने रखा। उन्होंने कहा कि इस तरह के शोध आधारित कार्य इतिहास की उपेक्षित कड़ियों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों के पीछे की विचारधारा, नेटवर्क और रणनीतिक दृष्टि पर भी चर्चा की।
लेखक प्रो. अमिताव चटर्जी ने पुस्तक के विषय और शोध प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बाघा जतिन के जीवन, प्रारंभिक क्रांतिकारी संगठनों और 1890 से 1915 के बीच बंगाल के क्रांतिकारी परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा की।
प्रो. के. अनिल कुमार ने स्वागत भाषण देते हुए अतिथियों, पैनलिस्टों और प्रतिभागियों का हार्दिक स्वागत किया। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण दौर पर गहन शोध के लिए प्रो. अमिताव चटर्जी की सराहना की और संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत IGNCA की पारंपरिक ज्ञान को समकालीन अकादमिक विमर्श से जोड़ने की प्रतिबद्धता को दोहराया।
उन्होंने कहा कि ज्ञानपथ श्रृंखला जैसी पहलों के माध्यम से IGNCA का जनपद संपदा प्रभाग भारतीय इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपराओं से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर निरंतर अकादमिक संवाद को बढ़ावा दे रहा है। यह प्रभाग मौखिक परंपराओं, क्षेत्रीय इतिहास, लोक जीवन, गुमनाम नायकों और गहरी सांस्कृतिक स्मृतियों का दस्तावेजीकरण करता है और उन पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करता है, ताकि उपेक्षित ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और आंदोलनों को वह विद्वतापूर्ण पुनर्मूल्यांकन मिल सके जिसके वे हकदार हैं। कार्यक्रम के अंत में डॉ. रेम्बेम्बो ओडुयो ने औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन दिया।
