भारती
बिहार के हर जिले, शहर, कस्बे और सुदूर ग्रामीण इलाकों में इन दिनों बेकाबू होती महंगाई ने आम नागरिक के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। दैनिक उपभोग की आवश्यक खाद्य वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों ने गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के मासिक आर्थिक गणित को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। राज्य के विभिन्न खुदरा बाजारों से मिल रही रिपोर्टों के मुताबिक, चीनी की कीमतें ₹70 प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जबकि रसोई का सबसे अहम घटक माना जाने वाला सरसों का तेल ₹215 प्रति लीटर के आंकड़े को पार कर चुका है। मीठे से लेकर कड़वे तक, रसोई के दो सबसे बुनियादी सामानों के दामों में हुई इस अचानक और बेतहाशा वृद्धि ने आम नागरिकों की थाली का स्वाद पूरी तरह बिगाड़ दिया है और लोग अब पेट भरने के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों में भारी कटौती करने को मजबूर हो गए हैं।
बाजार विशेषज्ञों, थोक व्यापारियों और स्थानीय किराना दुकानदारों का मानना है कि इस चौतरफा मूल्य वृद्धि के पीछे आपूर्ति शृंखला में पैदा हुआ गंभीर व्यवधान, मुख्य उत्पादक राज्यों से माल की कम आवक और मालभाड़े यानी ट्रांसपोर्टेशन लागत में हुई भारी बढ़ोतरी जैसे कई प्रमुख कारक जिम्मेदार हैं। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार में एडिबल ऑयल की कीमतों में आई उथल-पुथल का सीधा असर स्थानीय स्तर पर सरसों तेल के भाव पर देखने को मिल रहा है। दूसरी ओर, आम उपभोक्ताओं का स्पष्ट आरोप है कि संकट के इस माहौल का फायदा उठाकर स्थानीय आढ़ती और बड़े थोक व्यापारी बड़े पैमाने पर जमाखोरी और मुनाफाखोरी कर रहे हैं। खुदरा दुकानदारों का भी यही कहना है कि जब वे खुद ही थोक मंडियों से ऊंचे दामों पर सामान खरीदकर ला रहे हैं, तो आम ग्राहकों को रियायती दरों पर सामान बेचना उनके बस से बाहर हो चुका है, जिससे आए दिन दुकानों पर ग्राहकों और व्यापारियों के बीच तीखी बहस देखने को मिल रही है।
इस अभूतपूर्व महंगाई का सबसे भयावह और प्रत्यक्ष असर दिहाड़ी मजदूरों, छोटे दुकानदारों, किसानों और सीमित आय वाले नौकरीपेशा परिवारों पर पड़ा है। महीने के राशन का खर्च एकाएक 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ जाने की वजह से लोगों के सामने परिवार का गुजर-बसर करना एक बेहद कठिन चुनौती बन गया है। जिन घरों में पहले पूरे महीने का राशन एक साथ खरीद कर रख लिया जाता था, वहां अब लोग दैनिक आय के हिसाब से 100-200 ग्राम के छोटे पैकेटों में सामान खरीदने को मजबूर हैं। कई परिवारों ने तेल और चीनी के इस्तेमाल में 50 प्रतिशत तक की कटौती कर दी है। खान-पान में की जा रही इस मजबूरी भरी कटौती का सीधा असर बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के जरूरी पोषण स्तर पर पड़ रहा है, जिससे राज्य में आर्थिक तंगी के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चिंताएं भी गहराने लगी हैं।
सड़कों से लेकर राशन दुकानों और चौपालों तक आम जनता का भारी आक्रोश और निराशा साफ तौर पर देखी जा सकती है। नागरिक सरकार और खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की शिथिलता पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासनिक ढिलाई और निगरानी के अभाव का फायदा उठाकर मुनाफाखोर खुलेआम मनमाने दाम वसूल रहे हैं। आम जनमानस की पुरजोर मांग है कि राज्य प्रशासन को तुरंत हरकत में आते हुए विशेष जांच उड़नदस्तों का गठन करना चाहिए, जो मुख्य थोक मंडियों, बड़े गोदामों और खुदरा दुकानों पर औचक छापेमारी करें और जमाखोरी में लिप्त बड़े कारोबारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करें।
गहराते आर्थिक संकट और जन-आक्रोश को देखते हुए अब विभिन्न सामाजिक संगठनों, किसान यूनियनों और आम नागरिकों ने केंद्र व राज्य सरकार से तत्काल राहत उपाय लागू करने की गुहार लगाई है। लोगों की प्रमुख मांग है कि जब तक खुले बाजार में कीमतें नियंत्रित नहीं होतीं, तब तक सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली का दायरा बढ़ाकर सभी राशन कार्डधारकों को सरकारी डिपो के माध्यम से रियायती दरों पर चीनी और खाद्य तेल उपलब्ध कराना चाहिए। इसके साथ ही, आवश्यक वस्तुओं के बाजार मूल्य पर नजर रखने और उन्हें एक सीमा के भीतर रखने के लिए एक राज्यस्तरीय पारदर्शी मूल्य निर्धारण समिति बनाई जानी चाहिए, ताकि बिहार की एक बड़ी आबादी को इस कमरतोड़ महंगाई के दौर में कम से कम दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष न करना पड़े।
