यश पांडेय
टीवी धारावाहिक ‘शक्तिमान’ और ‘महाभारत’ में ‘भीष्म पितामह’ का आइकॉनिक किरदार निभाने वाले वरिष्ठ अभिनेता मुकेश खन्ना अपने बेबाक बयानों के लिए अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। हाल ही में आईएएनएस को दिए एक विशेष इंटरव्यू में उन्होंने भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ पर एक ऐसा चौंकाने वाला बयान दे दिया है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर देश की राजनीति तक में ऐतिहासिक बहसों को एक बार फिर से गरमा दिया है। मुकेश खन्ना ने दावा किया कि ‘जन गण मन’ वास्तव में हमारा सच्चा राष्ट्रगान नहीं है, बल्कि यह अंग्रेजी शासनकाल के दौरान ब्रिटिश महारानी क्वीन एलिजाबेथ को दी गई एक श्रद्धांजलि और उनकी प्रशंसा में रचा गया स्तुति गान था। उन्होंने कहा कि महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश हुकूमत की तारीफ में इसे तैयार किया था और आजादी के बाद हमने बिना सोचे-समझे इसे ही अपना राष्ट्रगान स्वीकार कर लिया। अपनी इस बात के साथ ही उन्होंने पुरजोर मांग उठाई कि ‘जन गण मन’ को तुरंत प्रभाव से हटाकर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम’ को आधिकारिक राष्ट्रगान बनाया जाना चाहिए और सरकार को इस दिशा में जल्द से जल्द फैसला लेना चाहिए।
मुकेश खन्ना का यह इंटरव्यू जैसे ही वायरल हुआ, जनसामान्य में यह सवाल तेजी से उठने लगा कि क्या वास्तव में भारतीय राष्ट्रगान का इतिहास किसी विदेशी औपनिवेशिक शासक की चाटुकारिता से जुड़ा हुआ है? हालांकि, इतिहासकार, संवैधानिक विशेषज्ञ और शोधकर्ता मुकेश खन्ना के इस दावे को पूरी तरह से भ्रामक, आधारहीन और ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत बताते हैं। सबसे बुनियादी और बड़ा तथ्यात्मक विरोधाभास तो यही है कि मुकेश खन्ना ने जिस क्वीन एलिजाबेथ का नाम अपनी टिप्पणी में लिया, उनका जन्म ही वर्ष 1926 में हुआ था। इसके विपरीत, नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इस कालजयी गीत की रचना उससे लगभग 15 वर्ष पूर्व, यानी वर्ष 1911 में ही कर दी थी। इस रचना को सबसे पहले 27 दिसंबर 1911 को कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 26वें वार्षिक अधिवेशन के दौरान सार्वजनिक रूप से गाया गया था। ऐसे में वर्ष 1926 में जन्मीं महारानी की स्तुति में 1911 में ही गीत लिखे जाने का दावा ऐतिहासिक और तर्क की कसौटी पर पूरी तरह से निराधार और बेतुका साबित होता है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों को देखें तो ‘जन गण मन’ को लेकर फैला यह भ्रम असल में दिसंबर 1911 में आयोजित ‘दिल्ली दरबार’ से जुड़ता है। उस दौरान ब्रिटेन के तत्कालीन सम्राट जॉर्ज पंचम ना कि क्वीन एलिजाबेथ भारत दौरे पर आए थे। कांग्रेस अधिवेशन के उसी कार्यक्रम में टैगोर के राष्ट्र-वंदना गीत के साथ-साथ एक अन्य बंगाली कवि द्वारा सम्राट के स्वागत में रचा गया एक अलग गीत भी प्रस्तुत किया गया था। उस समय के ब्रिटिश समाचार पत्रों की गलत रिपोर्टिंग और भ्रमित करने वाले अनुवाद के कारण यह अफवाह फैल गई कि टैगोर का गीत ही जॉर्ज पंचम की प्रशंसा में गाया गया था। हालांकि, खुद गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने जीवनकाल में इस दुष्प्रचार का कड़ा खंडन किया था। टैगोर ने अपने पत्रों में स्पष्ट लिखा था कि “मैं उस व्यक्ति या राजा की प्रशंसा में गीत कैसे लिख सकता हूँ जो मेरे देश का शोषक है? उस गीत में प्रयुक्त ‘भारत भाग्य विधाता’ शब्द सर्वशक्तिमान ईश्वर और भारत की जन-आत्मा के लिए हैं, किसी ब्रिटिश हुक्मरान के लिए नहीं।”
राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर यह बहस भारतीय जनमानस में कोई नई नहीं है, लेकिन इसका संवैधानिक पहलू पूरी तरह स्पष्ट है। आजादी के बाद जब देश का संविधान लिखा जा रहा था, तब भी संविधान सभा में राष्ट्रगान के चयन को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘जन गण मन’ को भारत के राष्ट्रगान के रूप में और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत के रूप में अंगीकार किया था। संविधान सभा ने यह भी स्पष्ट किया था कि स्वतंत्रता संग्राम में ‘वंदे मातरम’ के अद्वितीय योगदान को देखते हुए इसे ‘जन गण मन’ के समान ही पूर्ण सम्मान और दर्जा दिया जाएगा। इसके अलावा, मुकेश खन्ना ने इंटरव्यू में यह भी बताया कि उन्होंने संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के साथ मिलकर 7 मिनट का एक विशेष ‘वंदे मातरम’ ट्रैक रिकॉर्ड किया है, जिसे वह जल्द रिलीज करने वाले हैं। कुल मिलाकर, मुकेश खन्ना का यह हालिया बयान एक बार फिर से ऐतिहासिक तथ्यों की अधूरी जानकारी और सोशल मीडिया पर चलने वाले पुराने मिथकों को सामने लाता है, जिसने एक बार फिर देश में राष्ट्रगान के गौरवशाली इतिहास को लेकर चर्चा गरम कर दी है।
