प्रणव कुमार अभय/नई दिल्ली
देश के राजनीतिक इतिहास में एक दुर्लभ और अभूतपूर्व घटनाक्रम के तहत केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। हफ़्तों से जारी व्यापक छात्र आंदोलन और लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच धर्मेंद्र प्रधान का यह फैसला भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ है। लंबे समय तक शिक्षा मंत्रालय की कमान संभालने के बाद, युवाओं के आक्रोश और विरोध प्रदर्शनों के बीच उनका पद छोड़ना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार को छात्र आंदोलन की ताकत के आगे आखिरकार अपने रुख में बदलाव करना पड़ा। इस फैसले ने न केवल आंदोलनकारी छात्रों में भारी उत्साह भर दिया है, बल्कि लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में भी नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे गए अपने भावुक त्यागपत्र में धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह फैसला देश के लाखों युवाओं के व्यापक हित और नैतिकता को ध्यान में रखते हुए लिया है। “मेरे युवा साथियों” के नाम लिखे पत्र में उन्होंने अपनी चार दशकों की छात्र और शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी यात्रा का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उनके लिए यह फैसला किसी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय नहीं है, बल्कि वे नहीं चाहते कि देश की युवा शक्ति किसी भ्रम या कानूनी उलझनों के जाल में फंसी रहे। उन्होंने आशंका जताई कि जंतर-मंतर पर बनी संवेदनशील स्थिति का फायदा राष्ट्रविरोधी ताकतें उठा सकती हैं, इसलिए राष्ट्रहित, युवाओं के भविष्य और देश की एकता को सर्वोपरि रखते हुए उन्होंने अपना इस्तीफा सौंपने का निर्णय किया।
धर्मेंद्र प्रधान का यह इस्तीफा उस मोड़ पर आया जब दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन अपने चरम पर थे। शनिवार दोपहर जब आंदोलनकारी और सुरक्षा बलों के बीच गतिरोध बना हुआ था, ठीक उसी वक्त धर्मेंद्र प्रधान द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस्तीफे की घोषणा ने पूरे माहौल को बदल दिया। सूत्रों के अनुसार, सरकार उन्हें एक सम्मानित और सम्मानजनक विदाई देना चाहती थी, जिसके तहत उन्होंने खुद पहल करते हुए नैतिक जिम्मेदारी ली। मोदी सरकार के किसी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री का जनप्रदर्शनों और सड़क पर उतरी जनता के सीधे दबाव के चलते पद छोड़ना हाल के वर्षों की एक दुर्लभ राजनीतिक घटना मानी जा रही है।
शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान का कार्यकाल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के क्रियान्वयन और कई दूरगामी शैक्षणिक सुधारों के लिए जाना जाता रहेगा, लेकिन हालिया परीक्षा प्रणाली के संकट और CGPA व अन्य मांगों को लेकर उपजे व्यापक असंतोष ने उनके कार्यकाल पर गहरा असर डाला। इस्तीफे के बाद जारी अपने वक्तव्य में उन्होंने भगवान जगन्नाथ का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पद पर न रहते हुए भी वे देश की युवा शक्ति और ओडिशा की जनता की सेवा के लिए हमेशा समर्पित रहेंगे। फिलहाल शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाएगी, इसे लेकर कयासों का दौर शुरू हो गया है, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान के इस कदम ने देश में जन-जवाबदेही और छात्र शक्ति की एक नई मिसाल कायम कर दी है।
