डॉ सुभाष गौतम/ हिमांशु
भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जन्म जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित होने वाले इस विशाल जनजातीय सांस्कृतिक समागम का मुख्य उद्देश्य पूरे जनजातीय समाज में आत्मसम्मान और जागरण पैदा करना है ताकि देश-विदेश तक भगवान बिरसा मुंडा जी का संदेश पहुंचे, देश भर के जनजातीय भाई-बहन एक मंच पर आकर अपनी समृद्ध संस्कृति, लोककला, संगीत और जीवन दर्शन को साझा कर सकें और यह अनुभव करें कि वे अकेले नहीं है इस समागम में देश की 700 से अधिक जनजातियों में से अधिक से अधिक समुदायों को जोड़ने का प्रयास किया गया है विशेषकर उन दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुँच बनाई गई है जहाँ पहले संपर्क कम था, और चूंकि जनजातीय समाज में लोकगीतों, नृत्यों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के जरिए संस्कृति को बचाने में महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है इसलिए इसमें बड़ी संख्या में बहनों, युवाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सहभागिता रहेगी। इस समागम में सबसे अधिक संख्या छत्तीसगढ़ से आने की संभावना है जिसके साथ ही मध्य प्रदेश, उड़ीसा, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड, पूर्वांचल और पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों जैसे खासी समुदाय के वनवासी बंधु भी शामिल होंगे, जो अलग-अलग भाषाएं और परंपराएं होने के बावजूद पहली बार इतने बड़े स्तर पर एक साथ मिल रहे है इसके साथ ही वनवासी कल्याण आश्रम जनजातीय क्षेत्रों में गांवों के लोगों को आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बनाने के लिए स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सिलाई-कढ़ाई, बकरी पालन, मुर्गी पालन, सूअर पालन, गाय पालन, पत्तल, झाड़ू, चटाई और हाथ से कपड़ा बुनने जैसे स्थानीय रोजगारों को बढ़ावा दे रहा है स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हुए आश्रम द्वारा दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण दिया जा रहा है मेडिकल कैंप लगाकर शहरों के डॉक्टरों से इलाज कराया जा रहा है गंभीर मरीजों को जिला केंद्रों तक पहुँचाया जा रहा है और मेधावी बच्चों को शहरों में लाकर अच्छी शिक्षा दी जा रही है ताकि वे आगे चलकर अपने समाज को जागरूक कर सकें। पारंपरिक ‘गोटुल’ व्यवस्था, जो कि केवल रहने की जगह नहीं बल्कि जनजातीय समाज का पारंपरिक ज्ञान केंद्र थी जहाँ बच्चे खेती, जीवन शैली, सामाजिक व्यवहार, अनुशासन और पारंपरिक चिकित्सा सीखते थे। वह आज भी कर्नाटक, बिहार के कुछ हिस्सों और छत्तीसगढ़ में जीवित है अलग-अलग बोलियों के कारण सरकारी योजनाओं को समझने में आने वाली संवाद की बड़ी चुनौती से निपटने के लिए स्थानीय बच्चों को शिक्षित और प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि वे समाज के बीच जाकर योजनाओं और अधिकारों की जानकारी दे सकें, जिसके लिए गर्मियों में विशेष प्रशिक्षण शिविर भी लगाए जाते है इस समागम को लेकर वनवासी समाज में अद्भुत उत्साह और गर्व का माहौल है यहाँ तक कि कई लोग जिन्होंने कभी ट्रेन तक नहीं देखी वे भी अपने पहनावे, लोकनृत्य, संगीत, वाद्य यंत्र और पूजा पद्धति रूपी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की गंभीरता के साथ पहली बार दिल्ली आ रहे है जनजातीय समाज में बीमारी, शिक्षा या आर्थिक लालच के कारण होने वाली धर्मांतरण की समस्या भगवान बिरसा मुंडा जी के समय से ही एक बड़ा संघर्ष रही है जिसमें लोगों को अपनी जड़ों, स्वधर्म और पूर्वजों से जुड़े रहने की समझाइश दी जाती है वहीं दूसरी ओर घर वापसी की घटनाएं भी सामने आती है जहाँ धर्म बदलने के बाद भी कठिनाइयां दूर न होने और समाज से कटने का अहसास होने पर जब लोग वापस लौटना चाहते है तो गांव के लोग और समाज प्रमुख उन्हें दोबारा स्वीकार करते है अंततः यह समागम जनजातीय समाज के लिए एक नया रास्ता खोलेगा क्योंकि जब बिखरे हुए लोग इतने बड़े स्तर पर एक साथ आएंगे, तो उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा, वे अपनी संस्कृति को दोबारा मजबूती से अपनाने के लिए प्रेरित होंगे और जो बातें लोग भूल चुके है उन्हें फिर से याद करने तथा नई पीढ़ी तक पहुँचाने का अवसर मिलेगा, जो कि इस समागम की सबसे बड़ी सफलता होगी।
