शिवम सिंह

नई दिल्ली, 23 मई 2026
दिल्ली के ऐतिहासिक चाँदनी चौक स्थित दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में आज राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं जयंती के अवसर पर ‘वंदे मातरम् गाथा’ का भव्य आयोजन किया गया दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी और इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस कार्यक्रम में प्रख्यात किस्सागो और चित्रकार भारती दीक्षित ने अपनी अनूठी कला, शब्दों और जीवंत चित्रकारी के माध्यम से स्वाधीनता संग्राम के इस कालजयी मंत्र के इतिहास को दर्शकों के सामने जीवंत कर दिया तथा भारती दीक्षित ने कहा कि राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि भारत के स्वाधीनता संग्राम की चेतना और हर भारतीय के संकल्प का प्रतीक है इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों से जोड़ना था कार्यक्रम की शुरुआत ‘भारती की लोकमंगल गीत साधना’ (सावन हो…) से हुई, जिसके बाद इतिहास और साहित्य का अनूठा संगम देखने को मिला। प्रस्तुति के दौरान बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘गृहदाह’ और प्रांत संस्था अध्यक्ष विनोद मुखर्जी का विशेष उल्लेख किया गया कार्यक्रम में ‘धरती मेरी माँ है और मैं इसका पुत्र हूँ’ तथा ‘जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है के संदेश पर ज़ोर दिया गया इस गाथा को आगे बढ़ाते हुए महान कवि हरिवंश राय बच्चन की प्रसिद्ध कविता ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’, राष्ट्रीय स्वयंसेना संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलीराम हेडगेवार के जीवन के प्रेरक प्रसंगों और साल 1907 में मैडम भीखाजी कामा द्वारा जर्मनी में फहराए गए प्रथम सांस्कृतिक ध्वज जिस पर वंदे मातरम् अंकित था तथा वंदे मातरम के गौरवमयी इतिहास को भी याद किया गया तथा माधुरी दीक्षित ने वंदे मातरम की रचना के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि’वंदे मातरम्’ गीत की रचना 7 नवंबर 1875 को बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा बंगाल के कांतलपाड़ा में की गई थी जिसे बाद में 1882 में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया ब्रिटिश हुकूमत के ‘गॉड सेव द क्वीन’ के जवाब में रचे गए इस गीत ने 1905 के ‘बंग-भंग’ आंदोलन में जन-आंदोलन का रूप ले लिया था वर्ष 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार राजनीतिक मंच पर गाया और 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे ‘राष्ट्रगीत’ का दर्जा दिया ‘वंदे मातरम’ पर टिप्पणी करते हुए भारती दीक्षित ने कहा कि सदियाँ बीतने के बाद भी यह गीत आज उतना ही ऊर्जावान और प्रासंगिक है इस सफल आयोजन ने वहाँ मौजूद विद्यार्थियों और श्रोताओं में देशभक्ति की एक नई चेतना का संचार किया है।

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