प्रणव कुमार अभय

नई दिल्ली, 3 जून। श्रीराम लागू राष्ट्रीय नाट्य समारोह का आयोजन पुणे के रंग अवकाश थिएटर में आयोजित किया गया था। इस समारोह के लिए देश भर से कई नाटकों का चयन किया गया था। जिसमें दिल्ली स्थित नाट्य समूह पंचकोसी द्वारा द ज़ू स्टोरी नाटक का मंचन किया। इसमें पराग सरमा ने पीटर की भूमिका निभाई, जबकि सुमन वैद्य ने जेरी का किरदार अदा किया। इस नाटक का निर्देशन उत्पल झा ने किया था।

यह नाटक पीटर और जेरी जैसे किरदारों पर आधारित है, जिनकी मुलाक़ात एक पार्क की बेंच पर होती है। पीटर एक समृद्ध पब्लिशिंग एग्जीक्यूटिव है, जिसके परिवार में उसकी पत्नी, दो बेटियाँ, दो बिल्लियाँ और दो तोते हैं। दूसरी ओर, जेरी एक अकेला और हताश व्यक्ति है, जो किसी अन्य इंसान के साथ कोई सार्थक बातचीत करने के लिए बेताब है। वह पीटर की शांति में खलल डालते हुए उससे तरह-तरह के सवाल पूछता है और उसे अपनी ज़िंदगी की कहानियाँ तथा चिड़ियाघर जाने की वजह सुनने के लिए मजबूर करता है। नाटक की कथावस्तु एक सीधी रेखा में आगे बढ़ती है, जो दर्शकों के सामने वास्तविक समय में घटित होती है। व्यंग्यपूर्ण हास्य और लगातार बने रहने वाले नाटकीय तनाव के तत्व उस समय अपने चरम पर पहुँच जाते हैं, जब जेरी अपने शिकार (पीटर) को खींचकर अपने ही हिंसक और बर्बर स्तर पर ले आता है।

आखिरकार, पीटर अपने इस अजीब साथी से तंग आ जाता है और वहाँ से चले जाने की कोशिश करता है। जेरी, पीटर को बेंच से धक्का देना शुरू कर देता है और उसे अपनी जगह (इलाके) के लिए लड़ने की चुनौती देता है। अचानक, जेरी पीटर पर चाकू तान देता है, और फिर उसे नीचे गिरा देता है; मानो वह पीटर को चाकू उठाने का न्योता दे रहा हो। जब पीटर आत्मरक्षा में चाकू उठाता है, तो जेरी उस पर झपट पड़ता है और खुद ही उस चाकू पर गिरकर घायल हो जाता है। पार्क की बेंच पर खून से लथपथ जेरी अपनी ज़ू स्टोरी को वर्तमान क्षण से जोड़ते हुए खत्म करता है: क्या मैंने यह सब पहले से ही सोच रखा था? नहीं… नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता था। लेकिन मुझे लगता है कि मैंने ऐसा ही किया। दहशत से भर उठा पीटर, जेरी को छोड़कर वहाँ से भाग खड़ा होता है; वहीं जेरी के मुँह से निकले अंतिम शब्द ओह… माय… गॉड एक ओर व्यंग्यपूर्ण नक़ल का, तो दूसरी ओर करुण प्रार्थना का मिला-जुला रूप प्रतीत होते हैं।

By नवप्रभा टाइम्स

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