यश पांडेय
पहाड़ों पर लगातार हो रही मूसलाधार अतिवृष्टि और ऊपरी राज्यों के विभिन्न बांधों से छोड़े जा रहे लाखों क्यूसेक पानी के कारण उत्तर प्रदेश की दो सबसे प्रमुख धार्मिक नगरियों—वाराणसी और प्रयागराज—में उफनती नदियों ने भयंकर तबाही मचा रखी है। गंगा और यमुना नदियों का जलस्तर जिस तेजी से ऊपर चढ़ रहा है, उसने दोनों पौराणिक शहरों के तटीय और निचले मैदानी इलाकों में जलप्रलय जैसी स्थिति पैदा कर दी है। उफनते जल के इस विकराल रूप के कारण तटीय रिहायशी इलाकों का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है और हजारों परिवार अपने-अपने आशियानों को छोड़कर सुरक्षा की दृष्टि से सुरक्षित ऊंचे स्थानों तथा प्रशासनिक राहत शिविरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हो रहे हैं।धार्मिक नगरी वाराणसी (काशी) में गंगा नदी अपने सबसे रौद्र और भयानक रूप में नजर आ रही हैं, जिसके प्रभाव से काशी की पौराणिक पहचान और वैभव का प्रतीक माने जाने वाले सभी 86 घाट पूरी तरह जलमग्न होकर गंगा की लहरों में समा चुके हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहर में सबसे अधिक ऊंचाई और अत्याधुनिक स्थापत्य कला से निर्मित ‘नमो घाट’ भी मेन रोड से नीचे स्थित अपने सभी तलों के साथ पानी में पूरी तरह डूब गया है। घाटों की सीढ़ियों को डुबोने के बाद गंगा का बहाव अब मुख्य सड़कों और शहर की घनी आबादी वाली संकरी गलियों की ओर तेजी से दबाव बना रहा है।
इस प्राकृतिक आपदा का गहरा और सीधा असर काशी की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं, दैनिक अनुष्ठानों और आस्था पर भी पड़ा है। सुप्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट पर प्रतिदिन आयोजित होने वाली विश्वप्रसिद्ध भव्य गंगा आरती अब घाट की सीढ़ियों के बजाय मजबूरीवश पास स्थित भवनों की छतों पर कराने की नौबत आ गई है। आरती में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस और प्रशासन ने जलभराव वाले क्षेत्रों में चौकसी बढ़ा दी है और अलर्ट जारी कर दिया है, क्योंकि गंगा के जलस्तर का दबाव लगातार घाटों से सटे पौराणिक मंदिरों और प्राचीन भवनों की नीवों को प्रभावित कर रहा है।
इससे भी अधिक संकटपूर्ण, संवेदनशील और ह्रदयविदारक दृश्य शहर के महाश्मशान घाटों पर देखने को मिल रहा है, जहां अंतिम संस्कार और दाह-संस्कार की प्रक्रियाओं के लिए एक इंच भी सूखी जमीन शेष नहीं बची है। मोक्ष की कामना लेकर दूर-दराज के जिलों से अपने परिजनों के पार्थिव शरीर लेकर आने वाले लोगों के सामने भारी विकट परिस्थिति खड़ी हो गई है; नतीजतन मणिकर्णिका घाट पर बहुमंजिला इमारतों की छतों पर और हरिश्चंद्र घाट के आसपास स्थित जलमग्न संकरी गलियों में अंतिम संस्कार करने की नौबत आ गई है। स्थानीय पंडे-पुरोहित और परिजन छतों पर ही लकड़ी व अन्य पूजन सामग्री पहुंचाकर किसी तरह अंतिम क्रियाओं को पूरा करा रहे हैं।
वर्तमान समय में वाराणसी में गंगा का जलस्तर लगभग 4 सेंटीमीटर प्रति घंटे की अत्यंत चिंताजनक और भयावह रफ्तार से लगातार ऊपर चढ़ रहा है। तेजी से बिगड़ते हालात को देखते हुए जिला प्रशासन, स्थानीय पुलिस और एनडीआरएफ की संयुक्त टीमें नौकाओं के माध्यम से तटवर्ती इलाकों में चौबीसों घंटे गश्त और स्थिति की कड़ी निगरानी कर रही हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक अगले 24 घंटे काशीवासियों के लिए बेहद नाजुक और संवेदनशील माने जा रहे हैं, क्योंकि अगर जलस्तर के बढ़ने की यही गति कायम रही, तो गंगा नदी बहुत जल्द अपने चेतावनी बिंदु को पार कर घनी आबादी वाली शहरी बस्तियों को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लेगी।दूसरी ओर, तीर्थराज प्रयागराज में भी गंगा और यमुना दोनों नदियों के जलस्तर में निरंतर हो रही तीव्र बढ़ोतरी से बाढ़ का संकट अत्यंत चिंताजनक और विस्फोटक रूप ले चुका है। प्रयागराज का सुप्रसिद्ध संगम क्षेत्र और उससे सटे दर्जनों तटीय इलाके पूरी तरह जलभराव की चपेट में आ चुके हैं। स्थिति यह हो गई है कि संगम को जोड़ने वाले प्रमुख मार्गों—नागवासुकी रोड, मरीन ड्राइव और रिवर फ्रंट पर कई-कई फीट गहरा पानी भर चुका है, जिसके कारण वहां चारपहिया और दोपहिया गाड़ियों के स्थान पर अब केवल प्रशासनिक और निजी नावें चलती हुई दिखाई दे रही हैं।सड़कों के पूरी तरह जलमग्न होने और बाढ़ का पानी रिहायशी इलाकों के मुहाने तक पहुंचने से हजारों परिवारों पर बेघर होने का संकट गहराता जा रहा है। यद्यपि प्रयागराज में गंगा और यमुना नदियां फिलहाल अपने खतरे के निशान से थोड़ा नीचे बह रही हैं, लेकिन जलस्तर की वर्तमान वृद्धि दर ने जिला प्रशासन और तटीय निवासियों की चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं। बिगड़ते हालात से निपटने के लिए प्रशासन ने सभी संवेदनशील और निचले इलाकों में राहत व बचाव चौकियों को तुरंत प्रभाव से सक्रिय कर दिया है, राहत दल तैनात कर दिए गए हैं और तटीय इलाकों से नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर भेजने की व्यवस्थाएं पूरी कर ली गई हैं।
