प्रणव कुमार दुबे

बिहार के प्रशासनिक तंत्र में नौकरशाही के रवैये को लेकर एक बार फिर बड़ा और बेहद सख्त प्रशासनिक फैसला सामने आया है। राज्य में अधिकारियों द्वारा जन प्रतिनिधियों, विशेषकर विधायकों के फोन कॉल को अनसुना करने या नज़रअंदाज करने की बढ़ती शिकायतों के बाद सरकार ने सख्त रवैया अपनाया है। शासन के इस नए फरमान के तहत अब राज्य के किसी भी अधिकारी को विधायकों के फोन कॉल का तुरंत जवाब देना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि जन समस्याओं के समाधान में अनावश्यक देरी को पूरी तरह खत्म किया जा सके।

हाल के दिनों में राज्य विधानसभा के अध्यक्ष के साथ हुई एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान जनप्रतिनिधियों ने अपनी नाराजगी पुरजोर तरीके से दर्ज कराई थी। इस बैठक में कई विधायकों ने खुलकर शिकायत की थी कि जब वे अपने-अपने क्षेत्र की गंभीर समस्याओं, प्रशासनिक लापरवाही, आपदा प्रबंधन या आपातकालीन स्थितियों को लेकर अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर उनके कॉल का जवाब नहीं दिया जाता। कई बार बार-बार प्रयास करने के बावजूद अधिकारियों का ढुलमुल रवैया बना रहता है, जिससे जनता के हित प्रभावित होते हैं।

इसी महत्वपूर्ण बैठक में हुए गंभीर मंथन के बाद शासन स्तर पर यह सख्त और कड़ा कदम उठाने का फैसला लिया गया। विधानसभा अध्यक्ष की सख्त टिप्पणी और स्पष्ट निर्देशों के तुरंत बाद मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने पूरे प्रशासनिक अमले को एक कड़ा और स्पष्ट संदेश जारी कर दिया है। जारी दिए गए निर्देशों में साफ तौर पर कहा गया है कि जनप्रतिनिधियों से जुड़ाव और संवाद में किसी भी स्तर पर कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

जारी नए दिशा-निर्देशों के तहत यह पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है कि सभी अधिकारी पहली ही बार में विधायकों के फोन कॉल रिसीव करेंगे। यदि किसी अपरिहार्य स्थिति, बैठक या अति-व्यस्तता के कारण अधिकारी पहली बार में फोन नहीं उठा पाते हैं, तो उन्हें जैसे ही फुर्सत मिले या स्थिति सामान्य हो, तुरंत संबंधित विधायक को ‘रिंग बैक’ करना होगा। फोन वापस करके न केवल उनसे बात करनी होगी, बल्कि उनकी उठाई गई समस्याओं का संज्ञान लेकर त्वरित समाधान की दिशा में कदम भी बढ़ाना होगा।

मुख्य सचिव के इस कड़े निर्देश के तत्काल बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने भी पूरी सक्रियता दिखाते हुए एक औपचारिक पत्र जारी कर दिया है। यह पत्र केवल औपचारिकता भर नहीं है, बल्कि राज्य के शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस तंत्र को भेजी गई एक खुली चेतावनी है। सामान्य प्रशासन विभाग के इस पत्र में यह साफ कर दिया गया है कि जनप्रतिनिधियों के फोन न उठाने या उनकी समस्याओं का जल्दी समाधान नहीं करने की पुरानी व्यवस्था अब नहीं चलेगी, और इस संदर्भ में किसी भी बहानेबाजी को प्रशासनिक अवहेलना माना जाएगा।

यह विशेष आदेश राज्य के तमाम आला अधिकारियों को एक साथ प्रेषित किया गया है। इसमें सभी विभागों के अपर मुख्य सचिव, प्रधान सचिव, विभागाध्यक्ष, राज्य के पुलिस महानिदेशक, सभी प्रमंडलीय आयुक्त और सभी जिलों के जिलाधिकारी शामिल हैं। इन शीर्ष अफसरों के माध्यम से जिला और ब्लॉक स्तर तक के अधिकारियों को भी स्पष्ट निर्देश दे दिए गए हैं कि फोन कॉल को लेकर अब किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी।

राज्य के दूरदराज इलाकों में यह अक्सर देखा जाता रहा है कि क्षेत्र के लोग अपनी बुनियादी समस्याओं—जैसे बिजली, पानी, सड़क, कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और स्थानीय कल्याणकारी योजनाओं में हो रही धांधली—को लेकर सीधे अपने क्षेत्र के विधायकों के पास पहुंचते हैं। जब विधायक इन मुद्दों को हल कराने या प्रशासनिक हस्तक्षेप के लिए संबंधित अधिकारियों को फोन मिलाते हैं, तो कॉल अटेंड न होने से न केवल विधायकों की साख पर असर पड़ता है, बल्कि आम जनता का काम भी बीच में रह जाता है।

सरकार के इस नए और बेहद कड़े आदेश का सीधा फायदा अंततः आम नागरिकों को ही मिलेगा। शासन के इस फैसले से जहां एक तरफ अधिकारियों की सीधी जवाबदेही तय होगी, वहीं दूसरी तरफ विधायिका और कार्यपालिका के बीच बेहतर समन्वय देखने को मिलेगा। आने वाले दिनों में यदि किसी अधिकारी द्वारा इस आदेश की अवहेलना की शिकायत मिलती है, तो संबंधित अफसर के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई भी संभव है। इस कदम से न केवल जनप्रतिनिधियों का मान-सम्मान बहाल होगा, बल्कि जनता की समस्याओं का त्वरित निपटारा भी संभव हो सकेगा।

By नवप्रभा टाइम्स

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