प्रणव कुमार अभय
राजधानी दिल्ली के सबसे महंगे और प्रभावशील इलाके लुटियंस दिल्ली में स्थित केंद्रीय मंत्रियों के सरकारी आवासों के रखरखाव को लेकर छिड़ा सियासी संग्राम अब और गहरा गया है। मुख्य विपक्षी दल (काॅकरोच जनता पार्टी) ने एक सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन से प्राप्त आंकड़ों को सार्वजनिक करते हुए सरकार की प्राथमिकताओं पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का आरोप है कि एक ओर देश का आम नागरिक महंगाई और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्रियों की सुख-सुविधाओं और बंगलों के मेकओवर पर जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है।
आरटीआई से मिले आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले 12 वर्षों (2014 से 2026 तक) में लुटियंस दिल्ली के मंत्रियों के सरकारी बंगलों की मरम्मत, नवीनीकरण, पेंटिंग, इंटीरियर डिज़ाइनिंग और सौंदर्यीकरण पर कुल ₹547.68 करोड़ की भारी-भरकम राशि खर्च की जा चुकी है। इस विशाल धनराशि के सामने आने के बाद प्रशासनिक खर्चों की जवाबदेही और बजटीय प्राथमिकताओं पर देश भर में बहस छिड़ गई है।
प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, मंत्रियों के बंगलों के रखरखाव पर होने वाले सालाना खर्च में पिछले एक दशक में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2014-15 में जहां यह वार्षिक खर्च लगभग ₹27 करोड़ के आसपास था, वहीं वर्ष 2025-26 आते-आते यह आंकड़ा रिकॉर्ड ₹92 करोड़ प्रति वर्ष के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। इस तीव्र वृद्धि को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ताओं और वरिष्ठ नेताओं ने एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस फिजूलखर्ची को ‘सार्वजनिक कोष की खुली लूट’ करार दिया। पार्टी नेताओं का कहना है कि 12 वर्षों में खर्च की गई ₹548 करोड़ की रकम कोई सामान्य आंकड़ा नहीं है। देश का करदाता अपने खून-पसीने की कमाई से टैक्स इसलिए देता है ताकि राष्ट्र का बुनियादी ढांचा मज़बूत हो सके, न कि इसलिए कि मंत्रियों के बंगलों में बार-बार नई साज-सज्जा और इटैलियन मार्बल लगाए जाएं।
अपनी मांग को मज़बूती से रखते हुए राजनीतिक दलों ने आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण पेश किया। पार्टी के अनुसार, यदि इस ₹548 करोड़ का उपयोग देश के बदहाल सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचा सुधारने के लिए किया जाता, तो हज़ारों ग्रामीण और शहरी स्कूलों का पूरी तरह से कायाकल्प हो सकता था। इस राशि से हज़ारों नए आधुनिक क्लासरूम बनाए जा सकते थे, स्कूलों में डिजिटल ब्लैकबोर्ड, विज्ञान प्रयोगशालाएं और कंप्यूटर लैब स्थापित की जा सकती थीं।
इसके अलावा, विपक्षी दल ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि देश के कई हिस्सों में आज भी सरकारी स्कूलों के बच्चे पीने के स्वच्छ पानी, बिजली और अलग शौचालयों जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। ऐसे में मंत्रियों की आलीशान रिहाइश पर सालाना ₹92 करोड़ उड़ाना न केवल प्रशासनिक रूप से गैर-ज़िम्मेदाराना है, बल्कि नैतिक दृष्टिकोण से भी पूरी तरह से गलत है।
राजनीतिक गतिरोध को बढ़ाते हुए कॉकरोच जनता पार्टी ने सरकार से अपनी बजटीय प्राथमिकताओं पर तुरंत पुनर्विचार करने और वीआईपी संस्कृति पर सख्त अंकुश लगाने की मांग की है। पार्टी ने प्रस्ताव रखा कि मंत्रियों के आवासों के रखरखाव बजट पर एक निश्चित सीमा तय की जानी चाहिए और बचे हुए बजट को सीधे शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे जनकल्याणकारी क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
दूसरी तरफ, इस बड़े खुलासे और राजनीतिक घमासान के बाद सरकारी गलियारों में भी हलचल तेज़ हो गई है। हालांकि, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के जानकारों का तर्क रहता है कि लुटियंस दिल्ली में स्थित अधिकतर बंगले औपनिवेशिक काल के हैं और हेरितज इमारतों का हिस्सा हैं। इन पुरानी इमारतों की सुरक्षा, दीमक नियंत्रण और संरचनात्मक मज़बूती बनाए रखने के लिए रखरखाव पर खर्च होना स्वाभाविक है। इसके बावजूद, 2025-26 का ₹92 करोड़ का रिकॉर्ड खर्च अब एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है, जो आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है।
