डॉ सत्य प्रकाश तिवारी
पवित्र श्रावण मास के अंतिम सोमवार के अति पावन अवसर पर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में श्रेष्ठ श्री काशी विश्वनाथ की पावन नगरी वाराणसी पूर्णतः शिवमय नज़र आई। तड़के तीन बजे ब्रह्म मुहूर्त के अत्यंत शुभ काल में काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा भोलेनाथ की अलौकिक एवं भव्य मंगला आरती विधि-विधान के साथ संपन्न की गई। मुख्य पुजारी द्वारा डमरुओं की घनघोर गूंज, शंखनाद, घड़ियालों की ध्वनि और वेदों के सस्वर मंत्रोच्चार के बीच जब बाबा की महाआरती उतारी गई, तो संपूर्ण काशी विश्वनाथ धाम परिसर एक असीम और दिव्य ऊर्जा से आलोकित हो उठा। आरती से पूर्व बाबा के ज्योतिर्लिंग स्वरूप का भस्म, चंदन, केसर, गंगाजल, दूध और ताजे पुष्पों से अत्यंत मनोरम शृंगार किया गया था।
शास्त्रों में सावन के अंतिम सोमवार का विशेष महत्व वर्णित है, जिसे देखते हुए रविवार की शाम से ही देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का रेला काशी की पावन धरा पर जुटने लगा था। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली समेत देश के कोने-कोने से पहुंचे लाखों शिवभक्तों ने भोर होने से पहले ही मां गंगा के विभिन्न घाटों पर आस्था की पवित्र डुबकी लगाई। दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट, केदार घाट और मणिकर्णिका घाट पर स्नानार्थियों का तांता लगा रहा। गंगा स्नान के पश्चात नंगे पांव, गेरुआ वस्त्र धारण किए, हाथों में गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा और भस्म लिए भक्तों का असीम जनसैलाब काशी की प्राचीन गलियों से होता हुआ बाबा के दरबार की ओर बढ़ता गया। मंगला आरती के संपन्न होते ही जैसे ही गर्भगृह के विशाल कपाट आम जनता के लिए खोले गए, समूची काशी ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो उठी।
अंतिम सोमवार पर श्रद्धालुओं की अभूतपूर्व भीड़ के प्रबंधन के लिए वाराणसी पुलिस, पीएसी और मंदिर न्यास द्वारा सुरक्षा एवं यातायात की व्यापक रूपरेखा तैयार की गई थी। पूरे मंदिर क्षेत्र को चार अलग-अलग सुरक्षा ज़ोन में बांटकर वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती की गई। श्रद्धालुओं को बिना किसी बाधा के सुलभ दर्शन कराने के लिए गोदौलिया और मैदागिन से मंदिर की ओर आने वाले सभी मार्गों पर भारी और हल्के वाहनों का आवागमन पूरी तरह प्रतिबंधित कर नो-व्हीकल ज़ोन घोषित किया गया। धाम के भीतर क्राउड कंट्रोल के लिए किलोमीटरों लंबी जिग-जैग स्टील बैरिकेडिंग बनाई गई, जिससे अत्यधिक दबाव होने के बावजूद कतारबद्ध होकर भक्त निरंतर आगे बढ़ते रहे और व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में रही।
गर्भगृह में दिन भर भक्तों द्वारा बाबा विश्वनाथ के ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक का सिलसिला अनवरत चलता रहा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सावन के अंतिम सोमवार को भगवान शिव का किया गया पूजन कोटि-कोटि पुण्यों का फल प्रदान करता है और भक्तों के सभी जन्मों के पापों का क्षय करता है। इसी अटूट विश्वास के साथ श्रद्धालुओं ने घंटों कतार में लगकर अपनी बारी का इंतजार किया। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के अतिरिक्त काशी के अन्य पौराणिक शिव मंदिरों—जैसे तिलभांडेश्वर महादेव, महामृत्युंजय मंदिर, ओंकारेश्वर, जागेश्वर महादेव और केदारेश्वर मंदिर—में भी भोर से ही जलाभिषेक के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ा रहा और पूरा शहर मानो एक विशाल शिवालय में तब्दील हो गया।
कड़ी धूप और अत्यधिक उमस के बावजूद श्रद्धालुओं के अपार उत्साह और अटूट श्रद्धा में तनिक भी कमी नहीं देखी गई। विभिन्न प्रदेशों से आए हजारों कांवड़िये, जो सैकड़ों किलोमीटर का कठिन पैदल सफर तय कर कांवड़ में गंगाजल लेकर पहुंचे थे, भजनों की धुन पर नाचते-गाते बाबा के दर्शन के लिए आतुर दिखे। मंदिर प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं को असुविधा से बचाने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए थे। कतारों में खड़े भक्तों को गर्मी से राहत देने के लिए पूरे मार्ग पर जर्मन हैंगर टेंट, वाटर मिस्ट फैन और फर्श पर जूट की कालीन बिछाई गई थी। इसके साथ ही निशुल्क पेयजल वितरण, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और जगह-जगह स्वयंसेवकों की तैनाती की गई थी ताकि किसी भी श्रद्धालु की तबियत बिगड़ने पर तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान की जा सके।
काशी में सावन मास के समापन की ओर बढ़ता यह अंतिम सोमवार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न रहकर लोक-आस्था और भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े महाउत्सव के रूप में दिखाई दिया। गंगा की लहरों से लेकर काशी की ऐतिहासिक गलियों और चौराहों तक केवल गेरुआ रंग और शिवभक्त ही दृष्टिगोचर हो रहे थे। शहर की संवेदनशीलता और सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस के उच्च अधिकारी और स्थानीय प्रशासन स्वयं मौके पर मौजूद रहकर स्थिति का जायजा लेते रहे। मंदिर परिसर सहित संवेदनशील इलाकों में सैकड़ों सीसीटीवी कैमरों से कंट्रोल रूम के जरिए 24 घंटे निगरानी की जा रही थी, जबकि भीड़ की गति और घनत्व का सटीक आकलन करने के लिए ड्रोन कैमरों से हवाई सर्विलांस भी किया गया।
दोपहर में बाबा विश्वनाथ को 56 भोग अर्पित कर विशेष भोग आरती की गई, जिसके उपरांत पुनः दर्शन का क्रम जारी रहा। वहीं, संध्या काल में बाबा का भव्य और अलौकिक शृंगार दर्शन आयोजित किया गया, जिसमें भगवान शिव का भव्य राजसी रूप में शृंगार किया गया। इसे देखने के लिए स्थानीय निवासियों और दुनिया भर से आए पर्यटकों का भारी जमावड़ा मंदिर परिसर में लगा रहा। देर शाम गंगा आरती के समय दशाश्वमेध घाट पर हजारों दीयों की रोशनी से गंगा तट जगमगा उठे। आस्था, भक्ति, सुरक्षा व्यवस्था और जन-उत्साह के इस अद्भुत और ऐतिहासिक संगम ने सावन के अंतिम सोमवार को काशी के सनातन इतिहास में एक और अमिट अध्याय के रूप में अमर कर दिया।
