प्रणव कुमार अभय
बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री और बैकुंठपुर के विधायक मिथिलेश तिवारी के अपने ही गृह विधानसभा क्षेत्र में आयोजित भव्य सिंहासिनी महोत्सव पर प्रशासनिक अव्यवस्था और बदसलूकी का साया पड़ गया है। महोत्सव के दौरान कवरेज करने पहुंचे स्थानीय पत्रकारों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार और पुलिसिया तल्ख रवैये को लेकर मीडिया जगत में भारी आक्रोश और नाराज़गी की लहर दौड़ गई है। इस घटना ने न केवल आयोजन की प्रशासनिक साख को गहरा धक्का पहुंचाया है, बल्कि पूरे जिले में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
बैकुंठपुर की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को जन-जन तक पहुंचाने और क्षेत्र की सकारात्मक तस्वीर को वैश्विक पटल पर उभारने के उद्देश्य से सिंहासिनी महोत्सव का आयोजन प्रशासनिक स्तर पर बड़े पैमाने पर किया गया था। इस राजकीय व प्रशासनिक आयोजन को भव्य रूप देने और इसकी हर छोटी-बड़ी गतिविधि को आम जनता तक पहुंचाने के लिए स्थानीय मीडिया कर्मियों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। हालांकि, ज़मीनी धरातल पर पत्रकारों के प्रति अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों के नकारात्मक व्यवहार ने आयोजन के पूरे उत्साह को ठंडा कर दिया।
स्थानीय मीडिया प्रतिनिधियों का सीधा और स्पष्ट आरोप है कि पूरा प्रशासनिक अमला केवल कार्यक्रम की बाहरी चकाचौंध, मंच की भव्यता, वरिष्ठ अधिकारियों की खातिरदारी और वीआईपी मेहमानों की अगवानी में ही व्यस्त दिखाई दिया। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों के लिए न तो सुचारू और निष्पक्ष कवरेज का कोई प्रबंध किया गया था और न ही उनके बैठने या कार्य करने के लिए प्राथमिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं। कवरेज के दौरान पत्रकारों के साथ पुलिस प्रशासन द्वारा किया गया कथित अभद्र व्यवहार इस विवाद की सबसे मुख्य वजह बनकर उभरा है।
अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज कराते हुए पत्रकारों ने स्पष्ट रूप से कहा कि बैकुंठपुर की स्वाभिमानी माटी की अपनी एक ऐतिहासिक तासीर रही है—यह धरती न तो किसी अनुचित दबाव के आगे झुकती है और न ही झुकना जानती है। बैकुंठपुर के लोग और यहां का मीडिया जगत सम्मान मिलने पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को हमेशा तत्पर रहता है, लेकिन यदि आत्मसम्मान और गरिमा पर चोट पहुंचाई जाएगी, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। पत्रकारों ने चेतावनी दी है कि वे अपमान सहने के बजाय लोकतांत्रिक मर्यादा में रहकर कड़ा विरोध दर्ज कराना और प्रशासनिक आयोजनों का बहिष्कार करना भी अच्छी तरह जानते हैं।
चूंकि यह संवेदनशील मामला सीधे तौर पर बिहार के शिक्षा मंत्री और स्थानीय विधायक मिथिलेश तिवारी के अपने क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, इसलिए मीडिया कर्मियों की नज़रें पूरी तरह से उनके रुख पर टिकी हुई हैं। पत्रकारों का कहना है कि मंत्री जी को इस पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से लेना चाहिए और इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि आखिर उनके ही प्रतिनिधित्व वाले विधानसभा क्षेत्र में, सरकार के इतने बड़े मंच पर पत्रकारों के साथ सम्मानजनक व्यवहार क्यों नहीं हुआ और सुरक्षा तंत्र इतना निरंकुश कैसे हो गया।
पत्रकारों ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए याद दिलाया कि कैमरा और कलम ही वह सशक्त माध्यम हैं जिनके जरिए सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों, विकास कार्यों और प्रशासनिक तंत्र की उपलब्धियों की खबर आम जनता तक पहुंचती है। यदि खबर की रीढ़ कहे जाने वाले पत्रकार ही आयोजन स्थल पर असम्मानित, उपेक्षित और प्रताड़ित महसूस करेंगे, तो किसी भी सरकारी या प्रशासनिक कार्यक्रम का सकारात्मक संदेश समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना पूरी तरह असंभव हो जाएगा।
स्थानीय मीडिया संगठनों और वरिष्ठ पत्रकारों ने उम्मीद जताई है कि शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी मामले की नजाकत को समझेंगे। वे इस पूरे प्रकरण पर प्रशासनिक और पुलिस विभाग के आला अधिकारियों से सीधे बातचीत करेंगे, गैर-जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करेंगे और भविष्य में क्षेत्र के किसी भी आयोजन में पत्रकारों के सम्मान, सुरक्षा और गरिमा को अक्षुण्ण रखने का सख्त निर्देश जारी करेंगे।
फिलहाल, सिंहासिनी महोत्सव में हुई इस घटना के बाद से पूरे क्षेत्र के कलमकारों में गहरा असंतोष व्याप्त है। मीडिया जगत का कहना है कि यदि शासन-प्रशासन ने समय रहते पत्रकारों का सम्मान बहाल करने और दोषियों पर कार्रवाई करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो यह नाराजगी आने वाले दिनों में एक बड़े लोकतांत्रिक आंदोलन और प्रशासनिक आयोजनों के पूर्ण बहिष्कार का रूप ले सकती है।
