अनिल मिश्रा

महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) की कार्यप्रणाली, लगातार बनी प्रशासनिक शिथिलता और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आ रही गंभीर अनियमितताओं के खिलाफ हजारों अभ्यर्थियों का संचित आक्रोश आखिरकार पुणे की सड़कों पर जनसैलाब बनकर फूट पड़ा। पिछले कई सालों से दिन-रात एक करके, अपने उज्ज्वल भविष्य और एक अदद सरकारी नौकरी का सपना संजोने वाले युवाओं का धैर्य अब पूरी तरह से जवाब दे चुका है, जिसके परिणामस्वरूप सोमवार को पुणे शहर के इतिहास में प्रतियोगी छात्रों का एक अभूतपूर्व और विशाल विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। छात्रों के इस जबरदस्त आंदोलन, एकजुटता और तीखे आक्रोश ने न केवल राज्य प्रशासन व आयोग के शीर्ष अधिकारियों की नींद उड़ा कर रख दी है, बल्कि पूरे महाराष्ट्र में सरकारी भर्ती तंत्र की साख, उसकी गोपनीयता और निष्पक्षता पर बेहद गंभीर तथा बुनियादी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

यह ऐतिहासिक और विशाल प्रदर्शन पुणे के अति-प्रसिद्ध व सांस्कृतिक ओंकारेश्वर मंदिर चौक से अत्यंत अनुशासित लेकिन बेहद कड़े और आक्रामक तेवरों के साथ प्रारंभ हुआ। अपने हाथों में अपनी जायज मांगों से जुड़े नारे लिखे पोस्टर-बैनर थामे, हाथों में काले झंडे लहराते और पूरी भ्रष्ट भर्ती व्यवस्था के खिलाफ गगनभेदी नारेबाजी करते हुए अभ्यर्थियों का यह अपार जनसैलाब शहर के प्रमुख व्यावसायिक, ऐतिहासिक व प्रशासनिक मार्गों से गुजरता हुआ सीधे पुणे जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय की ओर बढ़ा। सड़कों पर उतरी अभ्यर्थियों की इस अप्रत्याशित और विशाल भीड़ के कारण मध्य पुणे के कई प्रमुख रास्तों पर यातायात जाम रहा, जिसे संभालने, वाहनों को वैकल्पिक मार्गों पर मोड़ने और स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए स्थानीय पुलिस प्रशासन को भारी मशक्कत और कड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी।

प्रदर्शन में शामिल अभ्यर्थियों ने अपने इस राज्यव्यापी आंदोलन को औपचारिक रूप से ‘आक्रोश मार्च’ का नाम दिया है, जो उनके दिलों में सालों से पनप रहे भारी असंतोष और निराशा की विभीषिका को साफ तौर पर बयां करता है। प्रदर्शनकारियों का बहुत स्पष्ट रूप से कहना था कि यह केवल कोई रस्म अदायगी, राजनीतिक स्टंट या प्रतीकात्मक सांकेतिक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि पुणे और राज्य के अन्य हिस्सों में छोटे-छोटे कमरों में बेहद तंगहाली व कठिन परिस्थितियों के बीच रहकर सालों-साल निष्ठापूर्वक तैयारी करने वाले उन लाखों युवाओं का दर्द, आंसू और संचित गुस्सा है, जिनकी कड़ी मेहनत और उम्मीदों पर बार-बार होने वाले पेपर लीक तथा प्रशासनिक धांधलियां पानी फेर देती हैं। कलेक्ट्रेट पहुंचकर छात्रों के एक अधिकृत प्रतिनिधिमंडल ने अपनी मांगों का एक विस्तृत ज्ञापन जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के माध्यम से राज्य सरकार को सौंपा।

प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों की सबसे प्रमुख, प्राथमिक और गैर-समझौतावादी मांग एमपीएससी की पूरी परीक्षा प्रणाली में तत्काल प्रभाव से शत-प्रतिशत पारदर्शिता सुनिश्चित करने की है। छात्रों का बेहद गंभीर आरोप है कि आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली विभिन्न प्रशासनिक व तकनीकी भर्ती परीक्षाओं में कथित तौर पर प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं, आधिकारिक उत्तर कुंजी में भारी और पेपर लीक होने की घटनाएं तथा उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन प्रक्रिया में तकनीकी गड़बड़ियां अब एक आम बात बन चुकी हैं। आयोग की इन लगातार हो रही गंभीर प्रशासनिक लापरवाहियों और अनियमितताओं के कारण सालों से ईमानदारी से लगन के साथ तैयारी करने वाले योग्य और मेधावी उम्मीदवार चयन प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं, जबकि अनुचित साधनों, पेपर लीक और भ्रष्टाचार का सहारा लेने वाले असामाजिक तत्व व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाकर महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हो जाते हैं।

आक्रोशित युवाओं ने इस बार किसी मध्यस्थता के बजाय एमपीएससी के मौजूदा शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ खुलकर सीधा मोर्चा खोल दिया है और आयोग के अध्यक्ष तथा सचिव के तत्काल प्रभाव से इस्तीफे की मांग पर पूरी तरह से अड़ गए हैं। छात्रों का बहुत सीधा और तार्किक तर्क है कि जब तक सर्वोच्च पदों पर बैठे शीर्ष अधिकारी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपना पद नहीं छोड़ते, तब तक आयोग के भीतर किसी भी प्रकार की निष्पक्षता, जवाबदेही और पारदर्शी सुधार की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। युवाओं ने राज्य सरकार से पुरजोर मांग की है कि इन अति-संवेदनशील और जिम्मेदारी भरे प्रशासनिक पदों पर बिना किसी देरी के केवल और केवल स्वच्छ, निष्पक्ष, दृढ़ इच्छाशक्ति तथा बेदाग छवि वाले वरिष्ठ अधिकारियों की ही तत्काल नियुक्ति की जानी चाहिए ताकि छात्रों का खोया हुआ विश्वास वापस लौट सके।

कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर आयोजित एक विशाल जनसभा में अभ्यर्थियों ने एमपीएससी के पूरे प्रशासनिक ढांचे, उसकी पुरानी नियमपुस्तिका और परीक्षा संचालन की पूरी प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव करने की आवाज उठाई। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि परीक्षा का विज्ञापन जारी करने से लेकर परिणाम घोषित करने, अभ्यर्थियों द्वारा दर्ज कराई गई आपत्तियों का पारदर्शी व त्वरित निस्तारण करने और अंतिम कट-ऑफ तय करने की पूरी समयसीमा को पूरी तरह से विवाद-मुक्त, डिजिटल और समयबद्ध बनाया जाए। इसके अतिरिक्त, युवाओं ने मांग की है कि भविष्य में पेपर लीक या किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी, नकल और फर्जीवाड़े में शामिल पाए जाने वाले संगठित माफिया गिरोहों और दोषियों के खिलाफ कठोरतम धाराओं के तहत त्वरित अदालती कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए एक बेहद सख्त व विशेष राज्यस्तरीय कानून बनाया जाए।

दिनभर चले इस अभूतपूर्व, अनुशासित और ऐतिहासिक ‘आक्रोश मार्च’ के बाद अब पूरी गेंद राज्य सरकार और संबंधित प्रशासनिक मंत्रालयों के पाले में चली गई है। पुणे जिला कलेक्ट्रेट के माध्यम से शासन को अपनी मांगों का विस्तृत ज्ञापन सौंपने के बाद अभ्यर्थी संगठनों और छात्र प्रतिनिधियों ने सरकार को दोटूक शब्दों में अंतिम चेतावनी दी है कि यदि उनकी इन जायज मांगों पर शीघ्रातिशीघ्र कोई ठोस, सकारात्मक और निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो यह ‘आक्रोश मार्च’ तो केवल एक शुरुआत भर माना जाए। आने वाले समय में इस आंदोलन को पुणे की सीमाओं से निकालकर राज्य के हर जिले, तालुका और गांव तक फैलाया जाएगा तथा पूरे महाराष्ट्र में एक अनिश्चितकालीन, ऐतिहासिक और उग्र जन-आंदोलन छेड़ा जाएगा जिसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी।

By नवप्रभा टाइम्स

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