प्रणव कुमार अभय
देश की राजधानी स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के 100वें स्थापना वर्ष के ऐतिहासिक शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा ओजस्वी और दूरगामी संबोधन दिया, जिसने पूरे देश के राजनीतिक और बौद्धिक विमर्श में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। आमतौर पर वाणिज्य, अर्थशास्त्र और भविष्य की विकास नीतियों पर केंद्रित रहने वाले इस बड़े शैक्षणिक मंच से पीएम मोदी ने देश को भीतर से खोखला करने वाली वैचारिक बीमारियों पर एक बेहद कड़ा और अप्रत्याशित प्रहार किया। उन्होंने ‘दिमागी नक्सलवाद’ को भारत की विकास यात्रा, शांति और राष्ट्रीय एकता का सबसे बड़ा दुश्मन करार देते हुए उस पर जमकर निशाना साधा।
समारोह में देश के कोने-कोने से आए मेधावी छात्रों, प्रख्यात शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और गणमान्य अतिथियों की भारी मौजूदगी के बीच प्रधानमंत्री ने एक बेहद दिलचस्प, सटीक और जनमानस से सीधे जुड़ने वाले चिकित्सा विज्ञान के उदाहरण का प्रयोग किया। उन्होंने देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य, वैचारिक टकराव और अपनी सरकार की सुदृढ़ कार्यप्रणाली को समझाने के लिए ‘होम्योपैथी’ के इलाज का विस्तार से जिक्र किया। पीएम मोदी का यह तंज इतना सधा हुआ और गहरा था कि इसने न केवल वहां मौजूद श्रोताओं को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया, बल्कि देश की वर्तमान वैचारिक उथल-पुथल की एक बिल्कुल स्पष्ट और जीवंत तस्वीर भी सबके सामने रख दी।
प्रधानमंत्री ने इस अनूठे रूपक को बेहद सरलता से समझाते हुए कहा, “आप सभी इस बात को भली-भांति जानते हैं कि होम्योपैथी की कार्यप्रणाली एलोपैथी या किसी भी अन्य दवाओं से बिल्कुल अलग होती है। होम्योपैथी की गोली जब किसी बीमार व्यक्ति को दी जाती है, तो वह बीमारी को तुरंत दबाने का काम नहीं करती है, बल्कि शुरुआत में कुछ समय के लिए वह उस बीमारी को और ज्यादा उभार देती है। यह दवा शरीर की गहराई में छिपी हुई बीमारी को खींचकर पूरी तरह से सतह पर लाती है, और उसके बाद ही उस बीमारी का असली, गहरा और हमेशा के लिए जड़ से खत्म करने वाला इलाज शुरू होता है।”
इसी बेहतरीन और व्यावहारिक उदाहरण को देश के मौजूदा हालात और अपनी सरकार की नीतियों से सीधे तौर पर जोड़ते हुए पीएम मोदी ने कहा कि बीते कुछ वर्षों में राष्ट्रहित और आंतरिक सुरक्षा को लेकर लिए गए कड़े फैसले भी ठीक उसी होम्योपैथी की दवा की तरह ही काम कर रहे हैं। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास और कड़े शब्दों में कहा, “तो जैसे ही मैंने दिमागी नक्सल वाली होम्योपैथी की गोली दी, सारे दिमागी नक्सल पूरी तरह से छटपटाकर और बिलबिला कर निकल कर बाहर आने लगे।” उनका यह सीधा बयान इस बात की तरफ स्पष्ट इशारा था कि सरकार की पारदर्शी और सख्त नीतियों ने उस पूरे इकोसिस्टम पर गहरी चोट की है, जो अब तक खामोशी से संस्थानों के भीतर बैठकर देश के खिलाफ काम कर रहा था।
प्रधानमंत्री ने स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा कि दशकों से हमारे समाज, शैक्षणिक संस्थानों और बड़े बौद्धिक मंचों पर एक ऐसा वर्ग हावी था, जो मानवाधिकारों, अभिव्यक्ति की आजादी और प्रगतिशीलता का छद्म आवरण ओढ़कर युवा पीढ़ी के मन में वैचारिक जहर घोलने का काम कर रहा था। लेकिन जैसे ही सरकार की ‘होम्योपैथिक खुराक’ ने अपना असर दिखाना शुरू किया और उनकी फंडिंग व नेटवर्क पर नकेल कसी गई, ये छिपी हुई, विभाजनकारी और देश विरोधी ताकतें पूरी तरह से बौखला गईं। आज अपनी जमीन और अपना प्रभाव खिसकता देख ये ताकतें अब अपने बिलों से बाहर आ गई हैं और उनका असली हिंसक व विघटनकारी चेहरा पूरे देश के सामने बेनकाब हो रहा है।
अपने प्रहार को और धार देते हुए पीएम मोदी ने उन ताकतों और सफेदपोश लोगों को भी आड़े हाथों लिया, जो सीधे तौर पर तो कोई हिंसक गतिविधि नहीं करते, लेकिन पर्दे के पीछे से इस जहरीले नरेटिव को खाद-पानी देते हैं। उन्होंने अत्यंत सख्त लहजे में कहा, “और जो लोग इस दिमागी नक्सल को बढ़ावा दे रहे हैं, अब देश की जनता उनका भी असली रंग बहुत अच्छी तरह से देख और समझ रही है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि आज का आम नागरिक, गांव का किसान और खासकर शहरी युवा वर्ग बहुत जागरूक हो चुका है। वह देश के विकास और विनाश के बीच का बारीक अंतर समझता है और अब वह किसी भी तरह के बौद्धिक छलावे या झूठे नैरेटिव के जाल में फंसने वाला नहीं है।
SRCC जैसे देश के सर्वश्रेष्ठ वाणिज्य संस्थान, जिसने देश को कई नामचीन अर्थशास्त्री, कुशल राजनेता, नीतिकार और बड़े उद्योगपति दिए हैं, वहां से यह सख्त संदेश देना एक बहुत ही सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। छात्रों की ओर सीधे मुखातिब होते हुए पीएम मोदी ने कहा कि युवा ही इस नए भारत की रीढ़ और भविष्य के कर्णधार हैं। उन्हें इस ‘दिमागी नक्सलवाद’ जैसी वैचारिक महामारियों से खुद को पूरी तरह सुरक्षित रखना होगा, क्योंकि जो लोग समाज को बांटने, हर बात में कमियां निकालने और चारों तरफ नकारात्मकता फैलाने का काम कर रहे हैं, वे कभी भी देश का या युवाओं के भविष्य का भला नहीं कर सकते।
प्रधानमंत्री ने युवाओं से भावुक और प्रेरणादायक अपील करते हुए कहा कि वे अपनी असीम ऊर्जा, अपनी उच्च स्तरीय शिक्षा और अपनी नवोन्मेषी प्रतिभा का उपयोग देश को जोड़ने, स्टार्टअप्स बनाने और भारत को एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने में करें। उन्होंने जोर देकर कहा कि 21वीं सदी का नया भारत अब पुरानी बेड़ियों और हीन भावना को तोड़कर बहुत आगे निकल चुका है और इसे रोकने की किसी भी विदेशी या स्वदेशी साजिश को देश की जनता अब सफल नहीं होने देगी।
अपने लंबे और ओजस्वी भाषण के अंतिम चरण में पीएम मोदी ने विश्वास जताया कि जिस तरह होम्योपैथी की दवा बीमारी को उभारकर उसे हमेशा के लिए जड़ से खत्म कर देती है, उसी तरह हमारी नीतियां और देश के युवाओं की जागरूकता इस वैचारिक कुरीति को हमेशा के लिए समाप्त कर देंगी। SRCC के मंच से दिया गया उनका यह बयान अब राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी चर्चा का केंद्र बन गया है, जिसे विश्लेषक देश की आंतरिक सुरक्षा और वैचारिक शुद्धि की दिशा में एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक संदेश मान रहे हैं।
