भारती
मध्य प्रदेश के पन्ना जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की एक ऐसी खौफनाक और शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जो किसी भी संवेदनशील इंसान को विचलित कर सकती है। राज्य सरकार भले ही जन-स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे करती हो और विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च करती हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों की जमीनी हकीकत इन दावों की पूरी तरह धज्जियां उड़ा रही है। जिले के बृजपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में स्वास्थ्य महकमे की बदहाली का जो ताजा मामला सामने आया है, उसने पूरे सरकारी चिकित्सा तंत्र की संवेदनशीलता और उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। एक तरफ सरकार सुरक्षित प्रसव के लिए करोड़ों का बजट पास करती है, वहीं दूसरी तरफ एक बेबस प्रसूता को अस्पताल के गंदे फर्श पर तड़पते हुए अपने बच्चे को जन्म देना पड़ता है।
यह पूरा हृदयविदारक वाकया पन्ना जिले के गजना गांव का है, जहां की 22 वर्षीय गर्भवती महिला रूबी गोंड सिस्टम की इस घोर लापरवाही का शिकार बनी हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, रूबी को तड़के सुबह करीब चार बजे अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। दर्द से तड़पती महिला की गंभीर हालत को देखकर परिजनों के हाथ-पांव फूल गए। ग्रामीण इलाका होने की वजह से वहां आवाजाही के साधन बेहद सीमित थे, इसलिए परिवार ने बिना कोई समय गंवाए सरकारी आपातकालीन सेवा ‘108 एंबुलेंस’ को फोन लगाया। परिजनों को कॉल सेंटर की तरफ से यह आश्वासन भी मिल गया कि गाड़ी जल्द ही उनके दरवाजे पर पहुंच रही है, जिससे उनके मन में एक आस जगी कि प्रसूता को समय पर अस्पताल पहुंचाकर सुरक्षित इलाज मिल जाएगा।
लेकिन इस झूठे आश्वासन के पीछे जो अमानवीय लापरवाही छिपी थी, उसका अंदाजा परिजनों को बिल्कुल नहीं था। दर्द से कराहती प्रसूता और उसके घरवाले लगातार सड़क पर टकटकी लगाए एंबुलेंस का इंतजार करते रहे। एक-एक पल पहाड़ जैसा बीत रहा था और देखते ही देखते दर्द और इंतजार के साये में पूरे चार घंटे गुजर गए। जब सुबह के आठ बज गए और कोई सरकारी सहायता उनके दरवाजे तक नहीं पहुंची, तो परिजनों ने घबराकर दोबारा कॉल सेंटर पर संपर्क किया। वहां से उन्हें यह बेहद गैर जिम्मेदाराना और हैरान करने वाला जवाब मिला कि उनकी एंबुलेंस खराब हो गई है, इसलिए वह मौके पर नहीं पहुंच सकती। इस एक जवाब ने पूरे परिवार को भारी संकट और मानसिक संत्रास में डाल दिया।
चार घंटे तक सिस्टम के झूठे भरोसे में रहने के बाद जब महिला की हालत बेहद नाजुक होने लगी, तो परिजन बुरी तरह घबरा गए। उन्होंने आनन-फानन में किसी तरह गांव के ही एक निजी वाहन की व्यवस्था की और बदहवास हालत में प्रसूता को लेकर बृजपुर स्वास्थ्य केंद्र की ओर भागे। रास्ते भर परिवार इस खौफ में था कि कहीं जच्चा-बच्चा को कुछ हो न जाए। उन्हें उम्मीद थी कि सरकारी बदहाली का जो सामना उन्होंने गांव में किया है, कम से कम अस्पताल पहुंचने के बाद वहां उन्हें बेहतर और त्वरित इलाज मिल जाएगा। लेकिन सरकारी सिस्टम की बेरुखी, लापरवाही और बदहाली का असली सिलसिला तो अभी अस्पताल में उनका इंतजार कर रहा था।
बृजपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने के बाद परिजनों की रही-सही उम्मीदें भी टूट गईं। तड़पती हुई प्रसूता को लेकर जब परिजन अस्पताल के गेट पर पहुंचे, तो वहां उन्हें तुरंत कोई उचित मेडिकल सुविधा, स्ट्रेचर या एक साफ बेड तक नसीब नहीं हो सका। अस्पताल परिसर में न तो कोई वॉर्ड बॉय मदद के लिए आगे आया और न ही वहां तैनात मेडिकल स्टाफ ने कोई तत्परता दिखाई। चारों तरफ फैली अव्यवस्था और कर्मचारियों की घोर लापरवाही के कारण हालात इतने बदतर हो गए कि दर्द से तड़पती रूबी को अस्पताल के प्रसूति वॉर्ड तक ले जाने का समय ही नहीं मिल पाया।
स्वास्थ्य केंद्र में किसी भी कर्मचारी के तुरंत मदद के लिए आगे न आने के चलते अंततः वही हुआ, जिसका डर था। महिला को अस्पताल के ठंडे, कठोर और असुरक्षित फर्श पर ही तड़पते हुए एक नवजात बच्ची को जन्म देना पड़ा। नवजात की किलकारी ने अस्पताल के फर्श पर गूंजकर पूरे स्वास्थ्य महकमे के गाल पर एक करारा तमाचा जड़ा है। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर इंसान सन्न रह गया। जिस जगह पर एक मां को सुरक्षित और संक्रमण मुक्त माहौल मिलना चाहिए था, वहां उसे फर्श पर लेटाकर अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी गईं। यह घटना सिर्फ एक लापरवाही नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी चिकित्सा व्यवस्था के फेल होने का साक्षात और दर्दनाक प्रमाण है।
इस पूरी अमानवीय घटना के बाद प्रसूता के परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों में स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ भारी आक्रोश भड़क उठा है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आपातकालीन एंबुलेंस सेवा का यह हाल सीधे तौर पर आम जनता की जान के साथ खिलवाड़ है। स्वास्थ्य केंद्र केवल दिखावे के लिए सफेद हाथी साबित हो रहे हैं, जहां आपात स्थिति में न तो गाड़ियां मिलती हैं, न स्ट्रेचर और न ही डॉक्टरों का कोई अता-पता रहता है। लोगों के मन में अब यह डर बैठ गया है कि यदि इस घोर लापरवाही के कारण जच्चा या बच्चा में से किसी की जान चली जाती, तो इसका जिम्मेदार आखिर कौन होता और क्या प्रशासन महज एक जांच समिति बनाकर मामले को रफा-दफा नहीं कर देता?
इस बेहद शर्मनाक घटना के बाद अब प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर कई सीधे और तीखे सवाल खड़े होते हैं, जिनका जवाब जनता पैराग्राफ दर पैराग्राफ मांग रही है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब 108 एंबुलेंस खराब थी, तो इसकी जानकारी परिजनों को तुरंत देने के बजाय उन्हें चार घंटे तक झूठे भरोसे में क्यों रखा गया और इस जानलेवा देरी का असली जिम्मेदार कौन है? इसके साथ ही सरकार को यह भी जवाब देना चाहिए कि हर साल स्वास्थ्य बजट के नाम पर आवंटित होने वाले अरबों रुपये आखिर कहां खर्च हो रहे हैं, जब एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसूता के लिए आपात स्थिति में एक स्ट्रेचर तक उपलब्ध नहीं है।
क्या ग्रामीण जनता की जान की सरकार की नजरों में कोई कीमत नहीं है, जो उन्हें इस तरह बदहाल व्यवस्था के भरोसे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है? यह घटना सिर्फ पन्ना जिले का एक अलग-थलग मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे ग्रामीण मध्य प्रदेश की लाचार और दम तोड़ती स्वास्थ्य सेवाओं की एक स्थायी हकीकत बन चुकी है। अब सरकार और स्थानीय प्रशासन से यह सीधा सवाल है कि अस्पताल परिसर के फर्श पर प्रसव होने देने वाले और एंबुलेंस के नाम पर धोखा देने वाले दोषी कर्मचारियों पर क्या महज़ खानापूर्ति वाली कागजी कार्रवाई होगी, या फिर उनके खिलाफ कोई सख्त कदम उठाकर इस चरमराती व्यवस्था को सुधारने की कोई ठोस पहल की जाएगी।
