यश पांडेय
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था, सरकारी अस्पतालों की जमीनी स्थिति और उससे जुड़ी अरबों रुपये की टेंडर व खरीद प्रक्रियाओं को लेकर राज्य का सियासी माहौल अचानक पूरी तरह गरमा गया है। राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता और सांसद सुधाकर सिंह ने राज्य सरकार और विशेष तौर पर स्वास्थ्य विभाग की पूरी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार के बेहद संगीन आरोप जड़े हैं। राजधानी पटना में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए उन्होंने विभाग की अंदरूनी खरीद प्रक्रिया पर सीधा हमला बोला। उन्होंने दावा किया कि बिहार के स्वास्थ्य क्षेत्र में चल रही गड़बड़ियां किसी एक मद या सीमित क्षेत्र तक ही महदूद नहीं हैं, बल्कि यह एक बेहद सुनियोजित, गहरी और व्यापक वित्तीय अनियमितता का हिस्सा हैं, जिसने पूरे महकमे के बजट व प्रबंधन को अपनी गिरफ्त में ले रखा है।
आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने मीडिया से मुखातिब होते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि हाल के दिनों में सरकारी अस्पतालों व मेडिकल परिसरों के लिए खरीदे जाने वाले डस्टबिन और सामान्य कचरा पात्रों की खरीद में सामने आया कथित भ्रष्टाचार तो महज एक छोटी सी बानगी यानी बर्फ का ऊपरी सिरा भर है। उन्होंने आक्रामक रुख अपनाते हुए दावा किया कि विभाग के भीतर असली खेल इससे कहीं ज्यादा विस्तृत और संस्थागत है। उनके मुताबिक, राज्य भर के सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और मेडिकल कॉलेजों के संचालन के लिए खरीदी जा रही महंगी व आधुनिक चिकित्सीय मशनरियों, जीवनरक्षक दवाओं, लैब पैथोलॉजी जांच उपकरणों और दैनिक उपयोग की अन्य तमाम सामग्रियों की कुल खरीद प्रक्रिया में विभागीय नियमों, निर्धारित मानकों और पारदर्शिता की खुलकर धज्जियां उड़ाई गई हैं।
अपने आरोपों को अधिक तथ्यपरक और गंभीर रूप देते हुए RJD सांसद ने बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट से संबंधित अत्याधुनिक मशीनों और प्रणालियों की टेंडरिंग व खरीद का मुद्दा विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने दावा किया कि केवल इन विशिष्ट मशीनों की खरीद प्रक्रिया के भीतर ही लगभग 300 करोड़ रुपये का भारी-भरकम घोटाला अंजाम दिया गया है। सांसद ने आरोप लगाया कि जिन अत्यधिक ऊंची दरों पर इन मशीनों और संबंधित उपकरणों की कागजी खरीद दिखाई गई है, वह खुले बाजार में उनकी वास्तविक दरों और तय मानकों की तुलना में बेहद अत्यधिक, अस्वाभाविक और संदेहास्पद है। उनके अनुसार, यह पूरा मामला सीधे तौर पर कागजी खानापूर्ति और पसंदीदा वेंडर प्रणालियों के जरिए सरकारी खजाने के पैसे की खुली लूट और गंभीर भ्रष्टाचार की तरफ साफ इशारा करता है।
सुधाकर सिंह ने अपने इन विस्फोटक बयानों के जरिए सरकार और विभागीय प्रशासनिक मशीनरी की मंशा पर बेहद कड़े सवाल दागे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग के जिम्मेदार पदों पर बैठे शीर्ष अधिकारियों, बिचौलियों और सांठगांठ करने वाले तंत्र की छत्रछाया में सरकारी पैसों के दुरुपयोग का यह सिलसिला धड़ल्ले से जारी है। सांसद ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जब-जब ऐसे वित्तीय घोटालों या संदिग्ध टेंडरों के मामले सार्वजनिक होते हैं, तब-तब विभागीय तंत्र जांच कराने के नाम पर मामले को दबाने, ठंडे बस्ते में डालने और लीपापोती करने में अपनी पूरी ताकत झोंक देता है। उन्होंने आम जनता के गाढ़ी कमाई के टैक्स के सही इस्तेमाल का हवाला देते हुए इस पूरी बहुचर्चित खरीद प्रक्रिया की किसी स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच एजेंसी से निष्पक्ष व समयबद्ध जांच कराए जाने की पुरजोर मांग उठाई है।
विपक्ष के इन अत्यंत आक्रामक बयानों ने राज्य में स्वास्थ्य विभाग की पारदर्शी टेंडरिंग व्यवस्था और सरकारी खरीद नीतियों पर कई अनुत्तरित और असहज करने वाले प्रश्न खड़े कर दिए हैं। प्रदेश के दूर-दराज के जिलों में स्थित सरकारी अस्पतालों में घटिया सामग्री की आपूर्ति और अत्यधिक बाजार दरों पर की गई संदिग्ध खरीदारी का यह मुद्दा सीधे तौर पर आम नागरिकों के स्वास्थ्य, उनके जीवन की सुरक्षा और सार्वजनिक वित्तीय पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है। ऐसे में 300 करोड़ रुपये के इस कथित बायो-मेडिकल वेस्ट घोटाले का सार्वजनिक होना सत्ता पक्ष के लिए न केवल एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन गया है, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक बहस और विपक्ष द्वारा चौतरफा घेराबंदी का कारण भी बन रहा है।
सांसद सुधाकर सिंह ने अपने वक्तव्य को विस्तार देते हुए यह भी आरोप लगाया कि यदि इस पूरे प्रकरण में टेंडर आवंटित करने वाली कंपनियों की प्रोफाइल, उनकी पूर्व योग्यता और बोलियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आएंगे। उन्होंने कहा कि ज्यादातर ठेके कुछ खास और पसंदीदा एजेंसियों को नियमों को शिथिल करके दिए गए हैं। सांसद का कहना था कि जब तक इस तरह की संस्थागत अनियमितताओं पर कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं होगी और जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक राज्य के दूर-दराज के इलाकों में गरीब और जरूरतमंद मरीजों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचा पाना महज एक कागजी दावा ही बना रहेगा।
इस पूरे घटनाक्रम पर राज्य के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल मीडिया बयानों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़क से लेकर बिहार विधानसभा के आगामी सत्र तक एक प्रचंड राजनीतिक बहस का कारण बन सकता है। मुख्य विपक्षी दल आरजेडी इस मुद्दे को सरकार की प्रशासनिक विफलता, नीतिगत खामियों और कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ एक प्रमुख राजनीतिक हथियार के रूप में भुनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। हालांकि, जिम्मेदार और निष्पक्ष पत्रकारिता के स्थापित मानकों के दृष्टिकोण से यह रेखांकित करना भी बेहद आवश्यक है कि ये तमाम संगीन आरोप पूरी तरह से RJD सांसद सुधाकर सिंह द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयानों और दावों पर आधारित हैं। खबर लिखे जाने तक इन आरोपों और 300 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय गड़बड़ी की किसी भी स्वतंत्र जांच एजेंसी, अदालत या आधिकारिक सरकारी निकाय द्वारा स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।
फिलहाल, इन सनसनीखेज और गंभीर आरोपों के सार्वजनिक होने के बाद से ही बिहार के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप का माहौल व्याप्त हो गया है। एक तरफ जहां विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार को चौतरफा घेरने, जन-आंदोलन बनाने और उच्चस्तरीय पारदर्शी जांच की मांग पर पूरी तरह से अड़ा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ पूरे प्रदेश की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार और स्वास्थ्य महकमा इन संगीन आरोपों के जवाब में क्या आधिकारिक आंकड़े या सफाई पेश करते हैं और क्या इस बहुचर्चित मामले में किसी प्रकार की आधिकारिक जांच प्रक्रिया शुरू की जाती है या नहीं।
