डॉ सत्य प्रकाश तिवारी

बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नया और अप्रत्याशित सियासी मोड़ देखने को मिल रहा है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर आम जनता तक सभी को हैरत में डाल दिया है। जिस ‘डबल इंजन’ सरकार की मिसाल अक्सर केंद्र और राज्य के बीच बेहतर प्रशासनिक तालमेल, त्वरित विकास और निर्बाध शासन व्यवस्था के रूप में दी जाती थी, उसी सरकार के भीतर से अब केंद्रीय जांच एजेंसियों के कार्यक्षेत्र और उनकी स्वायत्तता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। राज्य में सत्तासीन एनडीए सरकार द्वारा केंद्रीय जांच एजेंसियों के बिना पूर्व अनुमति या सीधी एंट्री पर अंकुश लगाने और राज्य की सहमति को अनिवार्य करने की सुगबुगाहट ने राज्य के राजनीतिक पारे को अचानक से काफी चढ़ा दिया है। यह कदम इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि इस प्रकार के नीतिगत फैसले या विरोध आमतौर पर उन राज्यों में देखने को मिलते हैं जहाँ केंद्र विरोधी दलों की सरकारें होती हैं, लेकिन बिहार के इस नए रुख ने राष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो किसी भी राज्य में केंद्रीय जांच एजेंसियों, विशेषकर सीबीआई या अन्य केंद्रीय जांच दलों के सीधे हस्तक्षेप का कड़ा विरोध विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में ही दर्ज किया जाता रहा है। जब-जब गैर-भाजपा या गैर-एनडीए शासित राज्यों ने केंद्रीय एजेंसियों को दी गई सामान्य सहमति (जनरल कंसेंट) को वापस लिया, तब-तब इसे केंद्र बनाम राज्य की राजनीतिक लड़ाई और केंद्रीय शक्तियों के कथित दुरुपयोग के खिलाफ एक ढाल के रूप में देखा गया। हालांकि, बिहार जैसे राज्य में, जहाँ भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) के गठबंधन की मजबूत सरकार चल रही है, अचानक से इस तरह का प्रशासनिक रुख अपनाया जाना बेहद असाधारण है। यह स्थिति इसलिए भी अजीब है क्योंकि जिस व्यवस्था का बचाव एनडीए के नेता अन्य राज्यों में करते रहे हैं, उसी व्यवस्था पर अब उनके अपने ही राज्य में नियंत्रण लगाने की बात सामने आ रही है।

इस पूरे घटनाक्रम के सामने आते ही पटना से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो चुका है और यह सवाल प्रमुखता से उठने लगा है कि क्या बिहार सरकार का केंद्र की एजेंसियों पर से विश्वास कम हो रहा है? कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह निर्णय महज़ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे राज्य के अपने अधिकारों और स्वायत्तता को सुरक्षित रखने की एक बेहद सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। राज्य सरकार में शामिल क्षेत्रीय नेतृत्व शायद यह संदेश देना चाहता है कि केंद्र में भले ही सहयोगी दल की सरकार हो, लेकिन राज्य के भीतर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण का प्राथमिक अधिकार राज्य सूची के तहत बिहार सरकार का ही रहेगा। इस कदम ने सत्ताधारी गठबंधन के भीतर भी एक दबी हुई राजनीतिक सरगर्मी और वैचारिक मतभेद को सतह पर ला खड़ा किया है।

गहन विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम के पीछे बिहार के जटिल राजनीतिक समीकरण और भविष्य के चुनावी गणित की अहम भूमिका हो सकती है। राज्य के शीर्ष नेतृत्व को संभवतः यह अंदेशा रहता है कि बिना किसी पूर्व सूचना या स्थानीय प्रशासन को विश्वास में लिए बिना की जाने वाली केंद्रीय कार्रवाइयों से न केवल राज्य की अपनी पुलिस व्यवस्था कमजोर होती है, बल्कि कभी-कभी इससे सरकार की छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त, स्थानीय नेताओं और नौकरशाहों पर केंद्रीय एजेंसियों की अचानक कार्रवाई से प्रशासनिक गतिशीलता भी बाधित होती है। यही कारण है कि राज्य प्रशासन अब किसी भी जांच या कार्रवाई की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, पूर्व सूचना और अंतर-एजेंसी समन्वय की मांग कर रहा है ताकि राज्य का प्रशासनिक संतुलन बना रहे।

दूसरी ओर, विपक्षी दल इस अप्रत्याशित स्थिति को भुनाने में जरा सी भी देर नहीं कर रहे हैं और इसे सीधे तौर पर ‘डबल इंजन’ के दावों पर हमला करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। विपक्षी नेताओं का साफ तौर पर कहना है कि यह निर्णय इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच आंतरिक स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और अविश्वास की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। विपक्ष का तर्क है कि जब राज्य और केंद्र दोनों ही जगह एक ही राजनीतिक गठबंधन का शासन है, तब भी यदि राज्य सरकार को केंद्रीय एजेंसियों से खुद का बचाव करने के लिए नियमों का सहारा लेना पड़ रहा है, तो इसका अर्थ है कि ‘डबल इंजन’ का तालमेल केवल नारों तक ही सीमित है और वास्तविक शासन में गंभीर मतभेद मौजूद हैं।

संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण से यदि इस पूरे मुद्दे को देखा जाए, तो भारत के संविधान में कानून-व्यवस्था, पुलिस और राज्य का आंतरिक प्रशासन प्राथमिक रूप से ‘राज्य सूची’ का विषय माना गया है। इस आधार पर राज्य सरकार द्वारा अपनी भौगोलिक सीमा के भीतर किसी भी बाहरी या केंद्रीय एजेंसी की सीधी कार्रवाई पर नियम तय करने की मांग कानूनी रूप से पूरी तरह से अमान्य नहीं ठहराई जा सकती। हालांकि, दूसरी तरफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संगीन मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसियों के पास विस्तृत और विशेष कानूनी अधिकार होते हैं, जो उन्हें बिना किसी रुकावट के कार्रवाई करने की अनुमति देते हैं। इस वजह से यह पूरा मामला अब प्रशासनिक अधिकारों बनाम केंद्रीय शक्तियों की एक नई कानूनी और संवैधानिक पेचीदगी में उलझता हुआ नजर आ रहा है।

इस पूरे प्रकरण ने केंद्र और बिहार राज्य के आपसी संबंधों को एक नए और अनिश्चित मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या केंद्र सरकार राज्य सरकार द्वारा उठाई गई इन प्रशासनिक चिंताओं और मांगों पर कोई सहयोगात्मक तथा लचीला रुख अपनाएगी, या फिर यह मुद्दा आने वाले समय में दोनों सरकारों के बीच तनाव और खींचतान का एक नया जरिया बन जाएगा? जिस तरह से दोनों तरफ से बयानों और रणनीतियों का दौर जारी है, उससे यह साफ जाहिर होता है कि बिहार की राजनीति में इस कदम से पैदा हुई हलचल इतनी आसानी से शांत होने वाली नहीं है और इसका प्रभाव आने वाले दिनों में और अधिक व्यापक रूप में देखने को मिल सकता है।

By नवप्रभा टाइम्स

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