नितिन गुप्ता। प्रणव कुमार

अखिल भारतीय साहित्य परिषद से संबद्ध ‘युवा पाठक शोधार्थी आयाम’ (दिल्ली प्रांत) के तत्वावधान में बीते 8 सितंबर 2026 को राजधानी दिल्ली के लाजपत नगर स्थित सरस्वती बाल मंदिर के भव्य जी. एल. टी. कांफ्रेंस हॉल में एक अत्यंत विचारोत्तेजक और गंभीर अकादमिक गोष्ठी का आयोजन संपन्न हुआ। ‘विभाजन विभीषिका : साहित्य से सिनेमा तक’ जैसे अत्यंत संवेदनशील एवं दूरगामी विषय पर केंद्रित इस परिचर्चा का मुख्य ध्येय 1947 के उस ऐतिहासिक दुःस्वप्न को केवल तारीखों और आंकड़ों के रूखे पन्नों तक सीमित न रखकर, उसे कालजयी साहित्य और जीवंत सिनेमाई अभिव्यक्तियों के माध्यम से पुनर्मूल्यांकित करना था। इस गरिमामयी आयोजन ने दिल्ली के बौद्धिक जगत, विशेष रूप से युवा शोधार्थियों को भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक विस्थापन और मानवीय त्रास पर नए सिरे से चिंतन करने के लिए एक सशक्त वैचारिक मंच प्रदान किया।

सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम का विधिवत एवं भव्य शुभारंभ अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संगठन मंत्री मनोज जी, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष विनोद बब्बर जी तथा दिल्ली प्रांत युवा आयाम की संयोजक प्रोफेसर सारिका कालरा द्वारा पारंपरिक वैदिक रीति से संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन कर किया गया। तत्पश्चात, कार्यक्रम की कुशल मंच संचालिका प्रोफेसर सारिका कालरा ने संपूर्ण सभागार की चेतना को एक सूत्र में पिरोते हुए सामूहिक ‘परिषद गीत’ का सस्वर गायन कराया। इस सुमधुर एवं गरिमामय गायन ने न केवल संपूर्ण वातावरण को एकाग्र और अनुशासित बनाया, बल्कि वहां उपस्थित प्रत्येक प्रबुद्धजन, शोधार्थी और विद्यार्थी के भीतर राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक उत्तरदायित्व और गंभीर अकादमिक विमर्श की भावना को गहराई से प्रदीप्त कर दिया।

समारोह के प्रथम तकनीकी सत्र में शोध पत्रों की प्रस्तुति का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न अंगीभूत महाविद्यालयों के प्राध्यापकों, निष्ठावान शोधार्थियों तथा ऊर्जावान विद्यार्थियों ने अपनी विषयगत विद्वत्ता का परिचय दिया। इस सत्र में विशेष रूप से युवा शोधार्थी महिमा, विष्णु मिश्र, सौम्या और मनीषा ने विभाजन की विभीषिका पर केंद्रित अपने गहन, प्रामाणिक और बहुआयामी शोध आलेख प्रस्तुत किए। इन प्रस्तुतकर्ताओं ने अपने पर्चे के माध्यम से यह बखूबी उजागर किया कि किस प्रकार उस युग के साहित्यकारों ने अपनी लेखनी से विस्थापन का दंश, मानवीय क्रूरता और टूटते आत्मीय संबंधों को दर्ज किया, और बाद में सिनेमा ने किस तकनीक व संवेदना के साथ उन लिखित आख्यानों को दृश्य माध्यम में रूपांतरित कर जन-मन तक पहुँचाया।

शोध पत्रों की प्रस्तुति के उपरांत कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष विनोद बब्बर जी का अत्यंत ओजस्वी, मर्मस्पर्शी और दिशा-निर्देशक उद्बोधन हुआ। उन्होंने देश के विभाजन से जुड़ी अपनी निजी स्मृतियों, प्रत्यक्षदर्शियों के अनुभवों और ऐतिहासिक साक्ष्यों को साझा करते हुए सभागार में मौजूद हर व्यक्ति को स्तब्ध और भावुक कर दिया। युवाओं को सीधे संबोधित करते हुए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आज की पीढ़ी को केवल विभाजन के इतिहास को सतही तौर पर जानने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन गूढ़ कारणों, राजनीतिक भूलों और सामाजिक परिस्थितियों का भी सूक्ष्म विश्लेषण करना चाहिए जिसके कारण यह त्रासदी घटी। उन्होंने बल देकर कहा कि वर्तमान युवा शक्ति को अपनी मूल संस्कृति और साहित्य के प्रति सतत सजग रहना होगा ताकि भविष्य में ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति न हो।

मुख्य वक्ता विनोद बब्बर जी ने अपने वक्तव्य को विस्तार देते हुए विभाजन की त्रासदी को अमर बनाने वाली कालजयी साहित्यिक कृतियों का विशद उल्लेख किया। उन्होंने कमलेश्वर के सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’, मोहन राकेश की मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत कहानी ‘मलबे का मालिक’ और भीष्म साहनी की अमर रचना ‘अमृतसर आ गया है’ जैसी कृतियों का बारीकी से विश्लेषण किया। इसके साथ ही उन्होंने विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के विविध पहलुओं को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि साहित्य जहाँ विस्थापन के मानसिक अवसाद और आत्मीय पीड़ा को शब्दों में पिरोता है, वहीं सिनेमा अपनी दृश्य शक्ति से उजड़े हुए आशियानों और उजड़ते मानवीय रिश्तों के सच को आने वाली पीढ़ियों के सामने जीवंत और शाश्वत बनाए रखता है।

पूरे सत्र के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं की सहभागिता अभूतपूर्व और स्तुत्य रही। उपस्थित युवाओं ने न केवल वक्ताओं की बातों को ध्यानपूर्वक सुना, बल्कि विभाजन आधारित साहित्य व सिनेमा के अंतर-संबंधों पर अपनी जिज्ञासाएँ शांत कीं और खुली परिचर्चा में बढ़-चढ़कर भाग लिया। सभागार का संपूर्ण माहौल इतिहास की उस गहरी पीड़ा, सामूहिक स्मृति और मानवीय संवेदनाओं के गंभीर ताने-बाने से ओत-प्रोत हो उठा। ऐतिहासिक तथ्यों, साहित्यिक प्रसंगों और सिनेमाई दृश्यों के सम्मिलित आलोक में हुई इस अत्यंत जीवंत और सार्थक चर्चा ने गोष्ठी के मूल उद्देश्य को पूर्णता प्रदान की, जिससे यह कार्यक्रम महज एक आयोजन न रहकर एक वैचारिक आंदोलन के रूप में स्थापित हुआ।

इस अवसर पर इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती (दिल्ली) के महामंत्री मनोज शर्मा जी की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम के गौरव को और बढ़ाया, जिन्होंने युवा शोधार्थियों के इस अकादमिक प्रयास की मुक्तकंठ से सराहना की। गोष्ठी के अंतिम चरण में आयोजन समिति की ओर से मंच पर उपस्थित अतिथियों, विषय विशेषज्ञों, पत्र प्रस्तुतकर्ताओं और दूर-दराज से आए श्रोताओं के प्रति सहृदय आभार प्रकट किया गया। औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन और राष्ट्र की अखंडता के संकल्प के साथ ही विभाजन की त्रासदी की स्मृति को समर्पित इस अत्यंत सफल, भव्य और विचारोत्तेजक संगोष्ठी का विधिवत समापन संपन्न हुआ।

By नवप्रभा टाइम्स

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