डॉ सत्य प्रकाश तिवारी
मुंबई: रिश्तों की गर्माहट और औलाद के प्यार पर डिजिटल ज़माने की बेरुखी और निष्ठुरता भारी पड़ गई। मुंबई के 74 वर्षीय बुजुर्ग व्यापारी शिवचरण रामरत्न गुप्ता की हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में शांति से आँखें मूंदते ही रिश्तों का खोखलापन दुनिया के सामने आ गया। पिछले तीन सालों से वृद्धाश्रम की चारदीवारी में अपनी आखिरी सांसें गिन रहे शिवचरण जी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिन बेटियों को उन्होंने नाज़ों से पाला, उनका अंतिम सफर महज़ एक डिजिटल पेमेंट और वीडियो कॉल का मोहताज बनकर रह जाएगा। दो साल पहले इसी आश्रम में उनकी पत्नी का भी देहांत हुआ था, और तब से वे पूरी तरह एकाकी जीवन जी रहे थे। जब आश्रम प्रबंधन ने भारी मन से उनकी तीनों बेटियों को फोन कर पिता के निधन की सूचना दी, तो आगे से जो जवाब आया, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया।
पिता की मौत की खबर सुनकर भी तीनों बेटियों में से किसी का दिल नहीं पसीजा। अंतिम दर्शन के लिए मुंबई से सोनीपत आने के बजाय बेटियों ने आश्रम प्रबंधन को ऑनलाइन 5,100 रुपए ट्रांसफर कर दिए और कह दिया कि अंतिम संस्कार वहीं सोनीपत में ही कर दिया जाए। हद तो तब हो गई जब उन्होंने मुखाग्नि की रस्म के लिए भी खुद आने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि जब दाह संस्कार हो, तो उन्हें वीडियो कॉल पर लाइव दिखा दिया जाए। पैसों के लेन-देन और स्क्रीन की वर्चुअल दुनिया में सिमट चुके इन रिश्तों ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता की दौड़ में इंसानियत किस कदर पीछे छूट चुकी है। जो बेटियां कभी पिता का आंचल पकड़कर चलना सीखती थीं, आज वही पिता के पार्थिव शरीर को स्पर्श करने तक से कतरा गईं।
आश्रम प्रबंधन और स्थानीय लोगों ने नम आंखों से शिवचरण जी का अंतिम संस्कार किया, लेकिन इस घटना ने समाज, परिवार और संस्कारों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जीवनभर खून-पसीना बहाकर अपनी औलाद का भविष्य सवारने वाले एक पिता के जीवन का ऐसा दर्दनाक अंत यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या आज के दौर में रिश्ते सिर्फ सहूलियत और पैसों तक ही सीमित रह गए हैं? वीडियो कॉल की स्क्रीन पर जलती चिता को देखने की इस मांग ने हर संवेदनशील दिल को झकझोर कर रख दिया है।
