करुणा नयन चतुर्वेदी
बच्चों को आरंभिक शिक्षा के दौरान ही यह पढ़ाया- लिखाया जाने लगता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उन्हें यह सीख प्रदान की जाती है कि यह संसार एक कुटुंब है और इसके अंदर कई तत्व विद्यमान हैं जिनकी सहायता से हम सभी सुचारू रूप से इस पृथ्वी पर निवास करते हैं। इसी समाज में पशु-पक्षी, जीव-जंतु भी रहते हैं जोकि मनुष्यों के साथ अपने अस्तित्व को साझा करते हैं। वैसे तो मनुष्यों को उनके आरंभिक उद्भव से ही पशुओं का सानिध्य प्राप्त होता रहा है। किंतु वफादारी और विश्वसनीयता के लिए मनुष्य ज्यादातर कुत्तों पर आश्रित रहे हैं। इसके प्रमाण आदिमानव काल से ही दिखलाई पड़ते हैं। जब आदिमानव अपनी रक्षा और इनका सहारा लेते थे। ख़ैर यह तो रही इतिहास की बात, पिछले दिनों नई दिल्ली झंडेवालान स्थित केशव कुंज में मानवीय और पशु संवेदना को ध्यान में रखकर बनाई गई अमित कुमार राय की फिल्म ओ माय गॉड की स्क्रीनिंग हुई। वैसे तो आधुनिक समाज में कुत्ता एक गली के रूप में प्रयोग होता है। लेकिन यह फिल्म उस शब्द के शाब्दिक अर्थ को ही बदल कर रख देती है। हर कहानी को चलचित्र का मुखौटा पहनाने के पीछे एक मंतव्य छिपा होता है, निर्देशक अमित ने इस फ़िल्म के माध्यम से पशुओं का इंसानों के प्रति भावनात्मक पक्ष को दिखाने का प्रयास किया है।
कहानी क्या कहती है?
यह कहानी मुख्य रूप से असम और बिहार को एक साथ लेकर चलती है। जहां असम का एक बच्चा अप्पू अपने कुत्ते के खो जाने पर पशु तस्करों से भीड़ जाता है। उसकी रक्षा करने के लिए पुलिस तंत्र की नाकामी को समाज के सामने लाता है। वहीं बिहार के एक मजदूर प्रिंस को भ्रष्ट स्वास्थ्य व्यवस्था और मानव तस्करों से बचाने के लिए उसका कुत्ता ऑस्कर अपनी जान की बाजी लगाकर भ्रष्ट व्यवस्था का पर्दाफाश करता है। दोनों ही कहानी मानव और पशुओं के परस्पर आपसी भावनात्मक पक्ष जिसमें प्रेम, करुणा, वियोग और समर्पण की भावना समाहित है, दर्शकों के सामने पर्दे पर लाने का काम करती है।
यह फिल्म सामान्यतः मनुष्य और पशु के आपसी पारस्परिक संवेदना पर केंद्रित है। इसमें पशुओं के प्रति करुणा के भाव को प्रमुखता प्रदान की गई है। इसके साथ ही यह भी दिखाया गया है कि कैसे भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों की वजह से आम नागरिकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हीं अधिकारियों के चलते पूरा तंत्र ही कठघरे में आ जाता है। दोनों ही तरफ पुलिस अपने वास्तविक कार्य को करने से परहेज करते हैं जिससे आम लोगों का तंत्र पर से भरोसा उठ जाता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक बिम्बों से मजबूत होती कहानी
फिल्म भोजपुरी, असमिया और बंगाली संस्कृति को बेहतरीन ढंग से दिखाया गया है। वहीं धार्मिक रूप से शौर्य और साहस की प्रतिमूर्ति जगत जननी मां जगदंबा और बजरंगबली को प्रतीकात्मक रूप से अधर्म का अंत करने वाली शक्ति के रूप में दिखाया गया है जोकि फिल्म के धार्मिक पक्ष को मुखरता प्रदान करती है। यह फिल्म कठिन समय में लोगों का आस्था के प्रति समर्पण भाव को दिखाने का प्रयास करती है। क्योंकि व्यक्ति जब समाज और व्यवस्था से असहाय होकर निराश हो जाता है तो उसके पास दैवीय शक्ति के समक्ष समर्पण के अलावा कोई चारा नहीं बचता। इसीलिए वह पूर्ण रूप से आस्था पर आश्रित हो जाता है।
कहानी कहां निराश करती है ?
फिल्म में अप्पू के किरदार को उम्र से अधिक चतुर, होशियार, परिपक्व और समझदार दिखाया गया है। उसका आरटीओ अधिकारी और पुलिस से ज्यादा परिपक्व होना दर्शकों को असहज करता है। पंकज त्रिपाठी का मास्टर जी की किरदार के रूप में इस फिल्म से जुड़ना फिल्म की सफलता की दृष्टिकोण से काफी मायने रखता है। किंतु फिल्म में उनके किरदार को बहुत सीमित की कर दिया गया है। पंकज का अभिनय इसमें थोड़ा नीरस लगता है। उनके ऊपर अभिनीत किए गए संवाद बहुत सतही और हल्के लगते हैं। इसके बावजूद वह अपनी प्रतिभा से भरपाई करने का भरसक प्रयास करते हैं। इंटरवल के बाद ज्यादा समय तस्करों को ढूंढने के साथ अप्पू और आरटीओ अधिकारी के संवाद में ही चला जाता है जिससे दर्शकों को थोड़ी बोरियत होने लगती है। वहीं फिल्म में मजदूरों के मनोरंजन के लिए जिन भोजपुरी गीतों का प्रयोग किया गया है, वह अश्लीलता के परिचायक हैं। इससे भोजपुरी की सांस्कृतिक छवि को नुकसान पहुंचता है। हालांकि बीच में एक जगह सोहर को शामिल करके निर्देशक भोजपुरी संस्कृति के साथ संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। इन सभी कमियों के बावजूद फिल्म का भावनात्मक पक्ष पर्दे पर ज्यादा प्रभावी दिखाई देता है और वह दर्शकों को बांधे रखता है।
निष्कर्ष :-
फिल्म भावनात्मक पक्षों के साथ शुरू होती है और इसी के साथ खत्म हो जाती है। यही वह तत्व है जो फिल्म को दर्शकों के साथ बांधे रखने में सहायक सिद्ध होती है। निर्देशन, अभिनय, संगीत और लेखन काफी बेजोड़ हैं। भारत की क्षेत्रीय संस्कृति को जिस प्रकार से फिल्म के प्रवाह को बनाए रखने के लिए जोड़ा गया है, वह प्रशंसनीय है। कुत्तों के साथ ऐसी विषय केंद्रित फिल्म का निर्देशन करना अपने आप में कठिन कार्य है। ऐसे में अमित ने अपने बेहतरीन निर्देशन कौशल का प्रदर्शन किया है। यह फिल्म बच्चों का साथ पशुओं के प्रति अगाध प्रेम को पर्दे पर लाने के काम प्रयास करती है। यह फ़िल्म फिल्मी जगत में मानवीय और पशु संवेदना पर केंद्रित नए विमर्श को खड़ा करने का काम करती है।
