नितिन गुप्ता/ प्रणव कुमार
नई दिल्ली, 29 जुलाई 2026 को महर्षि वेदव्यास जयंती के पावन अवसर पर प्रातः 8 बजे यमुना विहार क्षेत्र के विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों, अभिभावकों एवं शिक्षकों की सहभागिता से एक विशेष ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती, प्रांत मंत्री, राकेश कुमार एवं योगेश ने अत्यंत सुव्यवस्थित एवं प्रेरणादायी ढंग से किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ महर्षि वेदव्यास के जीवन, व्यक्तित्व और भारतीय ज्ञान परंपरा में उनके अतुलनीय योगदान के परिचय से हुआ।
विद्यार्थियों ने क्रमवार प्रस्तुति देते हुए वेदव्यास जी के जीवन के विविध पक्षों को सरल एवं प्रभावी शैली में प्रस्तुत किया उन्होंने बताया कि महर्षि वेदव्यास को वेदों के संकलन एवं विभाजन का महान कार्य करने के कारण “वेदव्यास” की उपाधि प्राप्त हुई।
भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक चेतना को संरक्षित एवं समृद्ध बनाने में उनका योगदान अद्वितीय माना जाता है।
कार्यक्रम में महर्षि वेदव्यास की महान रचनाओं पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने बताया कि महाभारत विश्व का सबसे विशाल महाकाव्य है, जिसमें केवल कौरव-पांडव युद्ध का वर्णन ही नहीं, बल्कि धर्म, न्याय, कर्तव्य, नीति, नेतृत्व, पारिवारिक मूल्यों और मानवीय जीवन के अनेक आयामों का गहन विश्लेषण मिलता है इसी महाग्रंथ का अमूल्य भाग श्रीमद्भगवद्गीता आज भी संपूर्ण मानवता के लिए जीवन-दर्शन का मार्गदर्शक ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त महर्षि वेदव्यास द्वारा अठारह पुराणों, ब्रह्मसूत्र तथा अनेक अन्य ग्रंथों की रचना एवं संकलन भारतीय साहित्य और अध्यात्म की अमूल्य धरोहर मानी जाती है।
महाभारत प्रसंग पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने उल्लेख किया कि जिस प्रकार महर्षि वेदव्यास की दिव्य कृपा से संजय ने धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के युद्ध का प्रत्यक्ष वर्णन सुनाया था, उसी प्रकार आधुनिक तकनीक के माध्यम से आयोजित इस ऑनलाइन कार्यक्रम ने दूर-दूर बैठे विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों को एक साझा मंच पर जोड़ दिया। इस प्रेरक उदाहरण के माध्यम से बच्चों को यह संदेश दिया गया कि समय बदल सकता है, साधन बदल सकते है, किंतु ज्ञान, संस्कार और सत्य का महत्व सदैव एक समान रहता है।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने महर्षि वेदव्यास के जीवन से प्रेरणा लेते हुए अध्ययनशीलता, सत्यनिष्ठा, अनुशासन, ज्ञानार्जन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प व्यक्त किया। और कहा कि भारतीय ऋषि परंपरा केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के निर्माण की सशक्त आधारशिला है।
समापन अवसर पर आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे ज्ञानवर्धक कार्यक्रम नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने, भारतीय इतिहास एवं साहित्य के प्रति सम्मान विकसित करने तथा नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।
ऑनलाइन माध्यम से आयोजित यह आयोजन ज्ञान, संस्कृति और आधुनिक तकनीक के सुंदर समन्वय का प्रेरणादायी उदाहरण बनकर सभी प्रतिभागियों के मन में अमिट छाप छोड़ गया।
