डॉ. कीर्ति शर्मा

भारत केवल सीमाओं से बना हुआ भू-भाग नहीं है। भारत एक विचार है, एक चेतना है, एक सभ्यता है और एक सतत प्रवाहित सांस्कृतिक अनुभूति है। इसी अनुभूति का सबसे प्रभावी, भावपूर्ण और जन-जागरणकारी स्वर है “वन्दे मातरम्”। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, समर्पण, त्याग, कर्तव्य और राष्ट्रीय एकात्मता का पवित्र उद्घोष है।

जब कोई भारतीय “वन्दे मातरम्” कहता है, तो वह किसी मूर्ति, पंथ या संप्रदाय की वंदना नहीं करता; वह उस भूमि को प्रणाम करता है जिसने उसे जन्म दिया, अन्न दिया, जल दिया, भाषा दी, संस्कृति दी और अस्तित्व दिया। “वन्दे मातरम्” का सरल अर्थ है “हे मातृभूमि, मैं तुम्हें नमन करता हूँ” । इस नमन में भक्ति भी है, कृतज्ञता भी है, राष्ट्रधर्म भी है और नागरिक उत्तरदायित्व भी।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम में केवल साहित्यिक रचना बनकर नहीं रहा। यह विदेशी शासन के विरुद्ध भारतीय आत्मा की पुकार बन गया। 1905 के बंग-भंग विरोधी स्वदेशी आंदोलन से लेकर अनेक क्रांतिकारी आंदोलनों तक “वन्दे मातरम्” ने जनमानस में अद्भुत ऊर्जा भरी। विद्यार्थी, महिलाएँ, किसान, संत, लेखक, क्रांतिकारी और सामान्य नागरिक सभी ने इस गीत में अपनी राष्ट्रीय आकांक्षा का स्वर पाया। अंग्रेज सत्ता इस उद्घोष से भयभीत थी, क्योंकि उसे मालूम था कि जब कोई राष्ट्र अपनी मातृभूमि को माँ मानकर खड़ा हो जाता है, तब उसे दास बनाए रखना असंभव हो जाता है।

 

“वन्दे मातरम्” की शक्ति इसी में है कि यह भारत को केवल राजनीतिक राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि माँ के रूप में देखता है। माँ केवल अधिकार का विषय नहीं होती, वह कर्तव्य का भी केंद्र होती है। माँ से केवल लिया नहीं जाता, उसके लिए त्याग भी किया जाता है। यही भाव स्वतंत्रता सेनानियों को फाँसी के फंदे तक मुस्कुराते हुए ले गया। उनके होंठों पर “वन्दे मातरम्” था, क्योंकि उनके मन में भारत माता की मुक्ति का स्वप्न था।

समय-समय पर इस गीत को लेकर विवाद भी उत्पन्न किए गए। कुछ लोगों ने इसके कुछ अंशों को धार्मिक दृष्टि से देखा और आपत्ति की। इतिहास में यह तथ्य भी है कि इसी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय आयोजनों में इसके प्रथम दो छंदों को विशेष रूप से स्वीकार किया गया, जिनमें मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, समृद्धि और जीवनदायिनी शक्ति का वर्णन है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने “जन गण मन” को राष्ट्रगान और “वन्दे मातरम्” को समान आदर के साथ राष्ट्रीय गीत का स्थान देकर भारत की ऐतिहासिक स्मृति और सांस्कृतिक चेतना दोनों का सम्मान किया। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि “वन्दे मातरम्” को संकीर्ण राजनीतिक विवादों में न घसीटा जाए। इसका मूल भाव किसी समुदाय के विरोध में नहीं है। यह गीत किसी को बाहर नहीं करता, बल्कि सबको मातृभूमि की गोद में जोड़ता है। भारत की सभ्यता “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की सभ्यता है। इसलिए “वन्दे मातरम्” का सही अर्थ है—राष्ट्र पहले, संकीर्णता बाद में; कर्तव्य पहले, अधिकार बाद में; एकता पहले, विभाजन बाद में।

आज की नई पीढ़ी को यह समझाना आवश्यक है कि राष्ट्रभक्ति आक्रामक नारा नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता है। राष्ट्रभक्ति का अर्थ किसी दूसरे से घृणा नहीं, बल्कि अपने देश के प्रति ईमानदारी, अनुशासन, श्रम, संवेदनशीलता और कर्तव्यबोध है। यदि “वन्दे मातरम्” केवल मंचों पर गाया जाए और जीवन में राष्ट्रहित पीछे रह जाए, तो यह गीत अधूरा रह जाएगा। इसका वास्तविक सम्मान तभी है जब हम भ्रष्टाचार से दूर रहें, समाज में सद्भाव रखें, राष्ट्र की संपत्ति की रक्षा करें, संविधान का आदर करें और भारत की एकता को सर्वोपरि मानें।

“वन्दे मातरम्” हमें याद दिलाता है कि भारत केवल सरकारों से नहीं बनता; भारत अपने नागरिकों की चेतना से बनता है। जब 145 करोड़ भारतीय अपने-अपने धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र और विचारों की विविधता के बावजूद मातृभूमि को सर्वोपरि मानते हैं, तभी भारत वास्तव में अखण्ड शक्ति बनता है।

इसलिए आज आवश्यकता विरोध या विवाद की नहीं, बल्कि सही समझ की है। “वन्दे मातरम्” को इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के संतुलित परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। यह गीत भारत की आत्मा का स्वर है, स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति है और भविष्य के भारत का नैतिक आह्वान है।

अंततः “वन्दे मातरम्” केवल गाने की वस्तु नहीं, जीने की प्रेरणा है। यह हमें बताता है कि मातृभूमि के प्रति प्रेम भावुकता नहीं, राष्ट्रनिर्माण का प्रथम संस्कार है।

वन्दे मातरम्।

By नवप्रभा टाइम्स

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