मां चली गई… बेटी ने बेटे का फर्ज निभाया, मणिकर्णिका घाट पर नम आंखों से दी मुखाग्नि

प्रणव कुमार दुबे

वाराणसी के कबीरचौरा अस्पताल में यह आवाज सुनकर हर किसी का दिल कांप उठा। एक बेटी अपनी मां के शव के पास बैठकर फूट-फूटकर रो रही थी। आंखों में आंसू थे, चेहरे पर बेबसी थी और हाथ जोड़कर वह लोगों से सिर्फ इतनी गुहार लगा रही थी कि कोई उसकी मां को अंतिम विदाई दिला दे। आठ घंटे तक वह अस्पताल में मां के शव के साथ अकेली बैठी रही, लेकिन न उसके पास अंतिम संस्कार के पैसे थे और न कंधा देने वाला कोई अपना। यह दर्दनाक कहानी सूजाबाद पड़ाव की रहने वाली सुनीता की है, जिसकी जिंदगी ने उसे एक के बाद एक ऐसे जख्म दिए कि वह भीतर से टूटती चली गई, लेकिन फिर भी हालात से लड़ती रही।

 

पिता के बाद पति ने छोड़ा, फिर भाई भी दुनिया से चला गया

सुनीता की जिंदगी संघर्षों से भरी रही। पहले पिता का साया सिर से उठ गया। शादी हुई तो लगा जिंदगी संभल जाएगी, लेकिन पति ने भी साथ छोड़ दिया। मजबूर होकर वह मायके लौट आई, जहां उसकी मां रुकमणी देवी और भाई ही उसका सहारा बने। कुछ समय तक जिंदगी किसी तरह चलती रही, लेकिन फिर भाई की मौत ने सुनीता को पूरी तरह अकेला कर दिया। अब उसकी दुनिया सिर्फ उसकी मां तक सिमट गई थी। मां-बेटी दोनों पड़ाव इलाके में किराए के छोटे से मकान में रहने लगीं। रुकमणी देवी बीमार रहती थीं और सुनीता दिन-रात उनकी सेवा में लगी रहती थी। घर का खर्च चलाने के लिए उसने दूसरे घरों में झाड़ू-पोछा और घरेलू काम करना शुरू किया। जो थोड़े बहुत पैसे मिलते, उन्हीं से मां की दवा, इलाज और दोनों का गुजारा चलता था। गरीबी और अकेलेपन के बावजूद सुनीता ने कभी हार नहीं मानी, क्योंकि उसकी मां ही उसके जीने की वजह थीं।

 

मां की मौत के साथ उजड़ गई पूरी दुनिया

बीती रात कबीरचौरा अस्पताल में बीमारी के चलते 65 वर्षीय रुकमणी देवी ने दम तोड़ दिया। मां के जाने के बाद सुनीता जैसे पूरी तरह टूट गई। जिस मां के लिए वह दिन-रात मेहनत कर रही थी, वही उसकी आंखों के सामने हमेशा के लिए चली गई। लेकिन दर्द सिर्फ मां को खोने का नहीं था। सबसे बड़ा दुख यह था कि उसके पास मां के अंतिम संस्कार तक के पैसे नहीं थे। वह अस्पताल में लोगों के सामने रो-रोकर मदद मांग रही थी। हर गुजरते पल के साथ उसकी बेबसी और बढ़ती जा रही थी।

जब मदद के लिए आगे आए अमन कबीर

इसी दौरान लावारिस, असहाय व गरीबों की मदद के लिए पहचाने जाने वाले समाजसेवी अमन कबीर को इस घटना की जानकारी मिली। खबर मिलते ही वह तुरंत कबीरचौरा अस्पताल पहुंचे। वहां सुनीता की हालत देखकर उनका दिल भी भर आया। रोते हुए सुनीता ने उनसे सिर्फ इतना कहा, “भईया… मेरी मां का प्रवाह करवा दीजिए, मेरे पास पैसे नहीं हैं।” यह सुनते ही अमन कबीर ने बिना देर किए पूरी जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। उन्होंने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार मणिकर्णिका घाट पर रुकमणी देवी का अंतिम संस्कार करवाया।

बेटी ने दिया कंधा, फिर मुखाग्नि देकर निभाया बेटे का फर्ज

मणिकर्णिका घाट पर जब मां की अर्थी उठी तो उसे कंधा देने वालों में सबसे आगे खुद सुनीता थी। उसने अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया और फिर मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज निभाया। घाट पर मौजूद हर शख्स की आंखें उस दृश्य को देखकर नम हो गईं। एक बेटी, जिसने जिंदगी भर मां का सहारा बनकर हर मुश्किल झेली, वही बेटी अंतिम समय में मां की आखिरी यात्रा में भी सबसे मजबूत सहारा बनकर खड़ी रही।

मदर्स डे पर रिश्तों की सबसे मार्मिक तस्वीर

अंतिम संस्कार के बाद सुनीता ने नम आंखों से अमन कबीर का धन्यवाद किया। उसने कहा कि जब उसका कोई अपना साथ देने वाला नहीं था, तब अमन ने भाई बनकर उसका हाथ थामा। मदर्स डे पर सामने आई यह कहानी सिर्फ गरीबी और बेबसी की कहानी नहीं है। यह उस मां-बेटी के रिश्ते की मिसाल है, जिसमें बेटी ने हर परिस्थिति में मां का सहारा बनकर बेटे का हर फर्ज निभाया। यह कहानी बताती है कि रिश्ते खून से नहीं, निभाने से बड़े होते हैं।

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