रामवीर सिंह
नैनीताल। प्रकृति के करीब जाने की इच्छा जब मित्रता, रोमांच और सीखने की जिज्ञासा से जुड़ जाए, तो यात्रा महज सफर नहीं रहती, बल्कि जीवन की ऐसी स्मृति बन जाती है। जिसे लंबे समय तक भुलाया नहीं जा सकता। चार प्राध्यापकों में डॉ. रामवीर, डॉ. गौरव कुमार, डॉ. अतुल कुमार और डॉ. चंद्रपाल सिंह की 17 दिसंबर 2022 से शुरू हुई पंगोट यात्रा भी कुछ ऐसी ही यादगार अनुभूति रही। दिल्ली से उत्तराखंड की पहाड़ियों तक पहुँची यह यात्रा प्राकृतिक सौंदर्य के आनंद के साथ पर्यावरण, जैव-विविधता और प्रकृति के प्रति मानवीय जिम्मेदारी का गंभीर संदेश भी छोड़ गई। यात्रा का आरंभ पी.जी.डी.ए.वी. महाविद्यालय से हुआ। सड़क मार्ग से आगे बढ़ते हुए गाजियाबाद, डासना, हापुड़, पिलखुआ और बाबूगढ़ को पार किया गया। रास्ते में सड़क किनारे रुककर अमरूद का स्वाद लेना यात्रा की सहजता और आत्मीयता को दर्शाता रहा। इसके बाद गढ़मुक्तेश्वर में गंगा के दर्शन हुए। मुरादाबाद और रामपुर से गुजरते हुए जैसे-जैसे दल नैनीताल की ओर बढ़ा, वैसे-वैसे मैदानों का परिचित दृश्य पीछे छूटता गया और पहाड़ों की हरियाली, घुमावदार सड़कें तथा बदलता मौसम यात्रा में नया रोमांच भरते गए। शाम लगभग 5:15 बजे पंगोट पहुँचने पर चारों यात्रियों ने महानगरीय जीवन से बिल्कुल अलग दुनिया का अनुभव किया। घने जंगल, पहाड़ों पर दिखाई देती बर्फ, स्वच्छ हवा और चारों ओर पसरी शांति ने सभी को प्रभावित किया। बाजार भ्रमण के दौरान पंगोट के बदलते स्वरूप पर भी चर्चा हुई। कभी छोटे से पहाड़ी गाँव के रूप में पहचाना जाने वाला पंगोट अब पर्यटन मानचित्र पर तेजी से उभर रहा है। होटल और रिसॉर्ट बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिला है, लेकिन इसके साथ प्लास्टिक कचरे और पर्यावरणीय दबाव की समस्या भी दिखाई देने लगी है। यही विरोधाभास यात्रा को केवल पर्यटन-वृत्तांत न रहने देकर पर्यावरणीय चिंतन से जोड़ता है। रात का अनुभव भी अपने आप में अनूठा था शहरों की कृत्रिम रोशनी से दूर खुले आकाश में असंख्य तारों को देखना सभी के लिए विशेष आकर्षण रहा। मोबाइल एप की सहायता से तारों और ग्रहों की पहचान करना इस अनुभव को और रोचक बनाता रहा रात्रिभोज के बाद साथियों ने बास्केटबॉल खेलते हुए समय बिताया और अगले दिन की कठिन पदयात्रा के लिए विश्राम किया।
अगली सुबह यात्रा का सबसे रोमांचक अध्याय शुरू हुआ। दल ने नैना पीक, जिसे चीना पीक के नाम से भी जाना जाता है, की चढ़ाई का निर्णय लिया। लगभग 2,615 मीटर की ऊँचाई तक पहुँचने वाला यह करीब छह किलोमीटर का पैदल मार्ग धैर्य और शारीरिक क्षमता की परीक्षा लेने वाला था। जंगलों से गुजरते हुए देवदार, ओक और बुरांश के पेड़ों के बीच से छनकर आती धूप, मिट्टी की सोंधी खुशबू और पक्षियों की आवाजों ने पूरे वातावरण को जीवंत बना दिया। यात्रा का शैक्षणिक पक्ष भी बेहद महत्वपूर्ण रहा वनस्पति-विज्ञानी डॉ. गौरव कुमार ने पहाड़ी क्षेत्र की वनस्पतियों, शैवाल, कवक, लाइकेन और मॉस आदि के बारे में साथियों को जानकारी दी। विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए नमूने भी एकत्र किए गए। इस तरह यह यात्रा मनोरंजन से आगे बढ़कर प्रकृति और जैव-विविधता को समझने का अवसर बन गई।
लगभग साढ़े चार से पाँच घंटे के प्रयास के बाद दल नैना पीक पहुँचा। वहाँ से नंदा देवी, त्रिशूल और कामेट जैसी हिमाच्छादित पर्वत चोटियों के मनोहारी दृश्य दिखाई दिए। नीचे फैली नैनी झील और नैनीताल नगर का विहंगम दृश्य थकान को मानो पल भर में भुला देता था हालांकि चोटी पर प्लास्टिक की बोतलें और चिप्स के पैकेट बिखरे देखना इस सुंदर अनुभव के बीच चिंता का कारण बना। यह दृश्य एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया—क्या पर्यटन का आनंद प्रकृति की कीमत पर लिया जाना चाहिए नैना पीक से उतरकर दल नैनीताल पहुँचा और बाजार से होते हुए नैनी झील के किनारे स्थित नैना देवी मंदिर के दर्शन किए। लगभग 20 से 25 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद सभी साथी काफी थक चुके थे रिसॉर्ट के मालिक वाहन लेकर उन्हें वापस ले गए। चाय और पकौड़ों के साथ दिनभर की थकान कुछ कम हुई। इसके बाद विश्व कप फुटबॉल फाइनल की रोमांचक कमेंट्री ने दिन को एक और यादगार अनुभव से जोड़ दिया।
वापसी के दिन पहाड़ों से नीचे उतरते हुए धीरे-धीरे मैदानों का परिचित दृश्य सामने आने लगा। रास्ते में एक पिकनिक स्थल पर कुछ समय रुककर चाय का आनंद लिया गया और फिर गाँवों, कस्बों तथा शहरों को पार करते हुए दल दिल्ली की ओर बढ़ता गया।
पंगोट यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि उसने पर्यटन और पर्यावरण के बीच के संबंध को बेहद सहज ढंग से सामने रखा। पहाड़ केवल घूमने-फिरने की जगह नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र है उनकी सुंदरता का आनंद लेने के साथ उनकी स्वच्छता, जैव-विविधता और प्राकृतिक संतुलन की रक्षा करना भी पर्यटकों की जिम्मेदारी है। प्लास्टिक मुक्त पर्यटन, जिम्मेदार व्यवहार और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ही पर्वतीय क्षेत्रों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सकते है अंततः यह यात्रा चार साथियों के बीच मित्रता, संवाद और आत्मीयता को मजबूत करने वाली स्मृति बनकर रह गई। रोजमर्रा की भागदौड़ से दूर बिताए गए ये दिन यह एहसास कराते है कि जीवन में कुछ यात्राएँ मंजिल तक पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को प्रकृति और अपने साथियों के और करीब लाने के लिए होती है। पंगोट की शांत वादियाँ, नैना पीक की ऊँचाइयाँ, नैनी झील की सुंदरता और हिमालयी प्रकृति का विराट स्वरूप इस यात्रा को केवल एक पर्यटन अनुभव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण की चेतना से जुड़ा अविस्मरणीय अध्याय बना देते है।
