प्रणव कुमार अभय
बिहार के उत्तर-पश्चिमी छोर पर स्थित गोपालगंज जिला अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक गौरव के लिए जाना जाता है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र ‘मल्ल महाजनपद’ का हिस्सा हुआ करता था और मध्यकाल में यहाँ चेरो राजाओं का आधिपत्य रहा। आधुनिक गोपालगंज का इतिहास लंबे समय तक पुराने सारण जिले से जुड़ा रहा, लेकिन प्रशासनिक सुधारों के चलते 2 अक्टूबर 1973 को इसे एक स्वतंत्र जिले के रूप में स्थापित किया गया। इस जिले की पहचान में ‘हथुआ राज’ का अतुलनीय योगदान रहा है; हथुआ के महाराजाओं द्वारा निर्मित भव्य महल और उनके द्वारा कला व शिक्षा को दिया गया संरक्षण आज भी यहाँ की मिट्टी में महसूस किया जाता है।
धार्मिक और पर्यटन के दृष्टिकोण से गोपालगंज की ख्याति विश्वप्रसिद्ध ‘थावे दुर्गा मंदिर’ के कारण है। लोककथाओं के अनुसार, माँ दुर्गा अपने भक्त रहशु भगत के प्रेम और पुकार पर कामाख्या से यहाँ प्रकट हुई थीं, जो इस स्थल को एक जागृत शक्तिपीठ बनाता है। स्वतंत्रता संग्राम के कालखंड में भी गोपालगंज के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध लोहा लेने में कभी कमी नहीं छोड़ी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहाँ के जनमानस ने जिस वीरता का परिचय दिया, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
वर्तमान में गोपालगंज अपनी उर्वर भूमि और गन्ने की खेती के कारण ‘चीनी के कटोरे’ के रूप में विख्यात है। गंडक नदी की अविरल धारा यहाँ की कृषि को समृद्ध करती है, तो वहीं यहाँ से खाड़ी देशों में काम करने वाले प्रवासियों की बड़ी संख्या जिले की अर्थव्यवस्था को एक वैश्विक मजबूती प्रदान करती है। अपनी लोक संस्कृति, भोजपुरी मिठास और ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे हुए गोपालगंज आज बिहार के एक प्रगतिशील और गौरवशाली जिले के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है।
