डॉ सत्य प्रकाश तिवारी
बिहार की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर का अंदरूनी असंतोष और वर्चस्व की लड़ाई अब एक बेहद दिलचस्प तथा नाजुक मोड़ पर पहुंच चुकी है। बीते कुछ दिनों से दो प्रमुख सहयोगी दलों—केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा —के बीच अनुसूचित जाति आरक्षण के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ और उप-वर्गीकरण को लेकर तीखी ‘जुबानी जंग’ जारी थी। इस मुद्दे पर बात यहां तक बढ़ गई थी कि दोनों नेताओं ने एक-दूसरे से मंत्री पद से इस्तीफे तक की मांग कर दी थी। इस विवाद की आग अभी शांत भी नहीं हुई थी कि अब लोजपा की ओर से सीधे मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी ठोक दिए जाने से गठबंधन के भीतर सियासी भूचाल आ गया है।
राजधानी पटना के व्हीलर रोड स्थित लोक जनशक्ति पार्टी के प्रदेश कार्यालय में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने खुले मंच से यह बड़ा ऐलान किया। लोजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सुरेंद्र विवेक के सम्मान और अभिनंदन समारोह के दौरान पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और विधायक राजू तिवारी ने कार्यकर्ताओं के समक्ष चिराग पासवान को बिहार का अगला मुख्यमंत्री बनाने का खुला संकल्प दोहराया। उनके इस ऐलान के बाद कार्यक्रम स्थल तालियों और नारों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा, जिससे राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है।
अपने संबोधन के दौरान विधायक राजू तिवारी ने कहा कि चिराग पासवान के दूरदर्शी और युवा नेतृत्व में पार्टी का संगठन राज्य के गांव-गांव और बूथ स्तर तक काफी तेजी से मजबूत हुआ है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को आह्वान करते हुए कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव में लोजपा अपने दम पर सरकार बनाने की दिशा में काम करेगी और सभी कार्यकर्ता मिलकर चिराग पासवान को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने का संकल्प पूरा करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिहार की जनता अब पुराने ढर्रे की राजनीति से बाहर निकलकर विकास और बदलाव की एक नई सोच को स्वीकार करने के मूड में है।
राजू तिवारी के इस बड़े दावे पर मुहर लगाते हुए पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष सुरेंद्र विवेक ने भी मंच से हुंकार भरी और बाद में पत्रकारों से बातचीत में इस लक्ष्य को और स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि लोजपा रामविलास जिस तरह से अपना जनाधार बढ़ा रही है, उससे पार्टी आने वाले चुनाव में बिहार की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरेगी। सुरेंद्र विवेक ने जोर देकर कहा कि जब लोजपा नंबर वन पार्टी बनेगी, तो स्वाभाविक तौर पर चिराग पासवान ही मुख्यमंत्री के पद के सबसे योग्य और प्राकृतिक उम्मीदवार होंगे। उनके इस बयान ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी अब केवल सहयोगी की भूमिका तक सीमित रहने के मूड में नहीं है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जब मंच से राजू तिवारी और सुरेंद्र विवेक चिराग पासवान को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प ले रहे थे, तब खुद चिराग पासवान भी वहां मौजूद थे। जमुई के सांसद अरुण भारती और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में हुए इस ऐलान पर चिराग पासवान ने कोई आपत्ति नहीं जताई। हालांकि, उन्होंने अपने संबोधन में कार्यकर्ताओं से पार्टी के ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ विजन को जन-जन तक पहुंचाने और संगठन को धरातल पर मजबूत करने का निर्देश दिया। जानकारों का मानना है कि मंच पर उनकी मौजूदगी और मौन सहमति यह दर्शाती है कि यह पार्टी की एक सोची-समझी भावी रणनीति का हिस्सा है।
हालिया लोकसभा चुनाव में लोजपा रामविलास के शत-प्रतिशत स्ट्राइक रेट ने पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। इसी चुनावी सफलता के बूते पार्टी अब राज्य की राजनीति में अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाना चाहती है। वहीं दूसरी तरफ, जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन द्वारा उठाए गए ‘दलितों के भीतर उप-वर्गीकरण’ के मुद्दे पर चिराग पासवान की आक्रामक घेराबंदी भी इस वर्चस्व की लड़ाई का हिस्सा है। मांझी जहां मुसहर-महादलित समुदाय के सबसे बड़े नेता के रूप में खुद को प्रोजेक्ट करते हैं, वहीं चिराग पूरे दलित समाज के सर्वमान्य चेहरे के रूप में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं।
गठबंधन के भीतर उपजे इस नए विवाद ने एनडीए के मुख्य घटक दलों—बीजेपी और जनता दल यूनाइटेड —के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रहती हैं, वहीं दूसरी तरफ सहयोगी दल के प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव द्वारा खुलेआम सीएम पद का दावेदार घोषित कर देना एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे और भावी नेतृत्व को लेकर नए दबाव का कारण बनेगा। बीजेपी नेतृत्व के लिए अब चिराग पासवान की इस महत्वाकांक्षा और मांझी के साथ जारी खींचतान को एक साथ संभालना एक कठिन टास्क बन गया है।
कुल मिलाकर, आरक्षण की समीक्षा के विवाद से शुरू होकर मुख्यमंत्री पद की दावेदारी तक पहुंचे इस घटनाक्रम ने बिहार का राजनीतिक पारा पूरी तरह से चढ़ा दिया है। विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल और महागठबंधन के अन्य घटक दल एनडीए में जारी इस अंदरूनी कलह पर चुटकी ले रहे हैं। चुनाव से पहले एनडीए के घटक दलों के बीच अपनी-अपनी जमीनी ताकत दिखाने और भविष्य की शर्तों को तय करने का यह सिलसिला आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति को और अधिक हलचल भरा बनाने वाला है।
