यश पांडेय
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले अंतर्गत महमूदाबाद क्षेत्र से एक ऐसी अभूतपूर्व, अत्यंत भावुक और सामाजिक सोच के ढर्रे को पूरी तरह झकझोर देने वाली विस्तृत खबर सामने आई है, जिसने न केवल क्षेत्र के हर नागरिक के दिल को गहराई से छू लिया है, बल्कि इंसानियत और खून के रिश्तों की अटूट डोर का एक नया इतिहास भी रच दिया है। प्राप्त विस्तृत जानकारी के अनुसार, महमूदाबाद के एक बेहद साधारण और सीधे-साधे परिवार में रहने वाले 55 वर्षीय व्यक्ति पिछले काफी समय से एक गंभीर और कष्टदायी बीमारी से लगातार संघर्ष कर रहे थे। चिकित्सकों के तमाम प्रयासों और परिजनों की दिन-रात की देखरेख के बावजूद, अचानक हालत ज्यादा बिगड़ने के कारण उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली और दुनिया को अलविदा कह दिया। इस दुखद और अचानक हुए निधन की सूचना जैसे ही गांव और आसपास के इलाकों में फैली, पूरे क्षेत्र में गहरा शोक व्याप्त हो गया तथा परिजनों के चीत्कार से माहौल गमगीन हो गया।
हालांकि, इस अचानक आए दुखों के पहाड़ के बीच असली परीक्षा और विषम परिस्थिति तब उत्पन्न हुई जब मृतक के दाह संस्कार और अंतिम यात्रा की तैयारियां शुरू की गईं। धार्मिक रीति-रिवाजों और सनातन मान्यताओं के अनुसार अंतिम संस्कार की रस्मों को आगे बढ़ाने के लिए जब परिजनों ने आसपास देखा, तो यह कड़वी सच्चाई सामने आई कि मृतक का न तो कोई पुत्र था और न ही परिवार में ऐसा कोई अन्य पुरुष सदस्य मौजूद था, जो आगे बढ़कर इस धार्मिक कार्य का बीड़ा उठा सके। हमारे समाज में सदियों से चली आ रही पितृसत्तात्मक मान्यताओं के तहत अंतिम संस्कार और मुखाग्नि का अधिकार केवल पुरुष वर्ग तक ही सीमित माना जाता रहा है। इसी दकियानूसी परंपरा और पुरुष सदस्य की अनुपस्थिति के कारण ग्रामीणों और उपस्थित रिश्तेदारों के बीच एक गहरा असमंजस, संशय और चिंता का माहौल निर्मित होने लगा कि आखिर इस विकट स्थिति में शव को अंतिम विदाई कैसे दी जाएगी।
इस अत्यंत विकट, संवेदनशील और असहनीय मोड़ पर, जब हर कोई किसी न किसी समाधान की तलाश में खामोश खड़ा था, तब रिश्तों की मर्यादा, भ्रातृ-स्नेह और मानवीय कर्तव्य की एक ऐसी जगमगाती मिसाल देखने को मिली जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। मृतक की 60 वर्षीय बुजुर्ग बहन ने बिना एक पल की देरी किए, अपनी आंखों के बहते आंसुओं को पोंछा और एक ऐतिहासिक व साहसिक निर्णय लिया। समाज क्या सोचेगा, सदियों पुरानी रूढ़िवादी बंदिशें क्या कहेंगी और लोग तरह-तरह की बातें करेंगे या नहीं—इन तमाम दकियानूसी बातों को दरकिनार करते हुए बुजुर्ग बहन ने पूरे आत्मबल के साथ घोषणा की कि वह अपने भाई की अंतिम विदाई में कोई कमी नहीं रहने देंगी और एक भाई के प्रति बहन के धर्म को खुद निभाएंगी।
इसके बाद, जब शवयात्रा श्मशान घाट पहुंची तो वहां का पूरा दृश्य किसी भी कठोर से कठोर हृदय वाले व्यक्ति को पिघला देने के लिए काफी था। श्मशान घाट के मुक्तिधाम पर सनातन विधि-विधान के साथ जब तैयारियां पूरी की गईं, तो 60 वर्षीय बुजुर्ग बहन अपने कांपते हाथों, थरथराते कदमों और सिसकियों से भरे गले के साथ अपने 55 वर्षीय छोटे भाई की चिता के समीप पहुंचीं। वैदिक मंत्रोचार और गमगीन सन्नाटे के बीच जैसे ही बहन ने अपने हाथ में जलती हुई लकड़ी लेकर अपने भाई की चिता को मुखाग्नि दी, वहां मौजूद हर एक व्यक्ति की आंखें आंसुओं से छलक पड़ीं और माहौल में एक भारी सन्नाटा व चीत्कार गूंज उठा। श्मशान घाट पर उपस्थित बुजुर्गों, युवाओं और महिलाओं का कलेजा उस भावुक पल को देखकर पसीज गया और हर कोई उस बहन के इस असीम साहस को देखता ही रह गया।
इस हृदयविदारक और ऐतिहासिक घटनाक्रम के बाद से ही महमूदाबाद, सीतापुर समेत पूरे आसपास के जिलों में इस बुजुर्ग बहन के निस्वार्थ प्रेम, अदम्य साहस और समर्पण की चौतरफा मिसालें दी जा रही हैं। स्थानीय ग्रामीणों और प्रबुद्ध जनों का कहना है कि यह केवल एक अंतिम संस्कार की प्रक्रिया मात्र नहीं थी, बल्कि यह वर्षों से चली आ रही रूढ़िवादिता और लैंगिक विषमता की दीवारों पर एक कड़ा और करारा प्रहार था। इस घटना ने समाज को स्पष्ट और दोटूक संदेश दे दिया है कि जब बात अपनों के मान-सम्मान, मानवीय संवेदनाओं और अंतिम फर्ज की आती है, तो बहन के निष्छल स्नेह और पवित्र प्रेम के सामने समाज की सदियों पुरानी कठोर से कठोर परंपराएं भी नतमस्तक हो जाती हैं।
