डॉ. कीर्ति शर्मा

महासचिव ,PIOCCI

पश्चिम एशिया पर मंडराते युद्ध के बादल अब केवल कूटनीति, सैन्य रणनीति या अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन की भाषा तक सीमित नहीं रह गए हैं। उनकी छाया अब तेल की कीमतों, गैस आपूर्ति, परिवहन लागत, खाद्य महंगाई, औद्योगिक उत्पादन और अंततः आम नागरिकों के घरेलू बजट तक पहुँचने लगी है। भारत जैसे देश के लिए, जो आज भी ऊर्जा आयात पर काफी हद तक निर्भर है, यह संकट कोई दूर की आशंका नहीं है। यह चुपचाप पेट्रोल पंपों, माल-ढुलाई के बिलों, बिजली की लागत, उर्वरकों की कीमतों, खाद्य बाजारों और छोटे व्यवसायों की बैलेंस शीट के रास्ते राष्ट्र के भीतर प्रवेश करता है।

जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो केवल पेट्रोल और डीजल ही महंगे नहीं होते। पूरी अर्थव्यवस्था उस दबाव को महसूस करती है। परिवहन महंगा होता है, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं, निर्माण और विनिर्माण की लागत बढ़ती है, किसानों के इनपुट खर्च बढ़ते हैं, एमएसएमई इकाइयों के मार्जिन सिकुड़ते हैं और मध्यम वर्ग अपने घरेलू खर्चों में कटौती करने को विवश होता है। गरीब वर्ग, हमेशा की तरह, सबसे अधिक प्रभावित होता है। इसलिए ऊर्जा संकट केवल ऊर्जा का विषय नहीं है; यह एक राष्ट्रीय आर्थिक चुनौती है।

इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सात सूत्रीय अपील को समझने की आवश्यकता है। नागरिकों से ईंधन बचाने, जहाँ संभव हो वहाँ वर्क-फ्रॉम-होम और वर्चुअल बैठकों को अपनाने, सार्वजनिक परिवहन और कार-पूलिंग का उपयोग करने, अनावश्यक विदेश यात्रा से बचने, गैर-आवश्यक सोने की खरीद को टालने, आयातित वस्तुओं के स्थान पर स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देने तथा प्राकृतिक खेती और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने की उनकी अपील कोई सामान्य सरकारी सलाह नहीं है। यह राष्ट्रीय आर्थिक अनुशासन का आह्वान है।

इस अपील को भय का संदेश नहीं माना जाना चाहिए। यह विवेक का संदेश है। वैश्विक अनिश्चितता के समय किसी राष्ट्र की रक्षा केवल सरकार के निर्णयों से नहीं होती; वह नागरिकों के आचरण से भी होती है। जब करोड़ों लोग थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ईंधन बचाते हैं, अनावश्यक यात्रा कम करते हैं, विलासितापूर्ण उपभोग को स्थगित करते हैं और घरेलू उत्पादों को समर्थन देते हैं, तब देश मूल्यवान विदेशी मुद्रा बचाता है और अपनी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को कम करता है।

भारत की आर्थिक शक्ति को केवल विकास दर के आँकड़ों से नहीं मापा जा सकता। उसे इस कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए कि वह बाहरी झटकों को कितनी मजबूती से सहन कर सकता है। प्रमुख अर्थशास्त्री बार-बार इस बात पर बल देते रहे हैं कि मुद्रास्फीति पर नियंत्रण, मुद्रा की स्थिरता, चालू खाते का संतुलन और राजकोषीय अनुशासन—ये सभी सतत विकास की आधारशिला हैं। वर्तमान पश्चिम एशिया संकट भारत की इसी क्षमता की परीक्षा ले रहा है।

यह केवल तेल की कीमतों का संकट नहीं है। यह जीवनशैली, उपभोग और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का भी संकट है। भारत के सामने प्रश्न केवल यह नहीं है कि वह कितना तेल आयात कर सकता है, बल्कि यह भी है कि वह उसका उपयोग कितनी समझदारी से कर सकता है। क्या सुविधा को कर्तव्य से ऊपर रखा जाएगा? क्या अनावश्यक विदेशी उपभोग को राष्ट्रीय बचत से अधिक महत्व दिया जाएगा? क्या आयातित चमक-दमक को स्वदेशी उत्पादन से अधिक मूल्यवान माना जाएगा? ये प्रश्न आर्थिक भी हैं और नैतिक भी।

भारत की प्रतिक्रिया तीन स्तरों पर होनी चाहिए।

नागरिक स्तर पर ईंधन की बचत, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग, उपभोग में संयम, बिजली की बचत, स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता और अनावश्यक विदेश यात्रा से परहेज आवश्यक है।

उद्योग स्तर पर ऊर्जा दक्षता, सौर ऊर्जा, वैकल्पिक ऊर्जा, स्थानीय सप्लाई चेन और जहाँ संभव हो वहाँ आयातित इनपुट पर निर्भरता कम करने की दिशा में तत्काल निवेश होना चाहिए।

नीति स्तर पर भारत को रणनीतिक तेल भंडार को मजबूत करना होगा, निर्यात को प्रोत्साहित करना होगा, आयात में अनुशासन लाना होगा, हरित ऊर्जा अपनाने की गति बढ़ानी होगी, प्राकृतिक खेती को समर्थन देना होगा और घरेलू विनिर्माण को बल देना होगा।

हर संकट अपने भीतर परिवर्तन का बीज लेकर आता है। यदि इसे दूरदृष्टि से संभाला जाए, तो वर्तमान ऊर्जा चुनौती ऊर्जा आत्मनिर्भरता के एक नए राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत बन सकती है। भारत के पास प्रचुर सूर्य प्रकाश है, तकनीकी प्रतिभा है, उद्यमशील ऊर्जा है, विशाल घरेलू बाजार है और युवा जनसंख्या है। अब आवश्यकता है, अनुशासन, दिशा और सामूहिक संकल्प की।

उद्योग जगत के नेता संभावित ऊर्जा मूल्य झटके की चेतावनी दे चुके हैं। लेकिन यह चेतावनी किसी एक आवाज तक सीमित नहीं है। अर्थशास्त्री, वैश्विक संस्थाएँ, ऊर्जा विशेषज्ञ और नीति-चिंतक, सभी कठिन समय की ओर संकेत कर रहे हैं। संदेश स्पष्ट है: आर्थिक विवेक अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है।

युद्ध सीमाओं पर सैनिक लड़ते हैं, लेकिन आर्थिक युद्ध नागरिक अपने दैनिक जीवन में लड़ते हैं। पेट्रोल बचाना, अनावश्यक यात्रा से बचना, सोने की खरीद स्थगित करना, भारतीय उत्पाद खरीदना, बिजली बचाना और स्थानीय उत्पादन को समर्थन देना भी राष्ट्र-सेवा के कार्य हैं। ये व्यक्तिगत स्तर पर छोटे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन सामूहिक रूप से राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं।

भारत को घबराहट की आवश्यकता नहीं है। उसे गंभीरता की आवश्यकता है। उसे प्रदर्शन की नहीं, अनुशासन की आवश्यकता है। उसे अंध उपभोग की नहीं, संयमित विकास की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री की सात सूत्रीय अपील का सार सरल और शक्तिशाली है, संकट के समय सुविधा राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकती। अपव्ययी उपभोग नहीं, संयम। अनावश्यक आयात नहीं, आत्मनिर्भरता। भय नहीं, अनुशासित तैयारी।

यदि भारत इस चुनौती को अवसर में बदल देता है, तो आने वाला ऊर्जा संकट केवल एक आर्थिक झटका बनकर नहीं रहेगा। वह आर्थिक परिपक्वता, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय अनुशासन की दिशा में एक निर्णायक मोड़ बन सकता है।

By नवप्रभा टाइम्स

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