नितिन गुप्ता
झारखंड की राजधानी रांची में प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन को अब एक नया और बेहद भावुक संबल मिला है। अपनी गंभीर शारीरिक अस्वस्थता और डॉक्टरों की सख्त हिदायतों को नजरअंदाज करते हुए वरिष्ठ समाजसेवी बबीता जी सीधे रांची के प्रदर्शन स्थल पर पहुंचीं और आंदोलनरत अभ्यर्थियों का मजबूती से समर्थन किया। अपने स्वास्थ्य की परवाह किए बिना जब वह युवाओं के बीच पहुंचीं, तो पूरा माहौल छात्र एकता के नारों से गूंज उठा और आंदोलनकारियों में एक नई ऊर्जा का संचार देखने को मिला।
गंभीर बीमारी से जूझने के बावजूद छात्रों के बीच पहुंचीं बबीता ने उनके संघर्ष को पूरी एकजुटता के साथ अपना समर्थन दिया। उन्होंने मीडिया और वहां मौजूद जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि आज हमारे देश और राज्य के युवाओं की पीड़ा बेहद बड़ी है। जब एक छात्र वर्षों तक दिन-रात मेहनत करता है और फिर परीक्षाओं में धांधली या पेपर लीक की खबरें सामने आती हैं, तो उसका मनोबल पूरी तरह टूट जाता है। उन्होंने बेहद भावुक शब्दों में कहा कि उनकी तबीयत भले ही ठीक न हो, लेकिन युवाओं के टूटते सपनों और उनके भविष्य के संघर्ष के आगे उनकी बीमारी बहुत छोटी है।
यह पहली बार नहीं है जब बबीता युवाओं के अधिकारों के लिए सड़क पर उतरी हों, बल्कि इससे पूर्व दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय स्तर के छात्र और युवा आंदोलनों में भी उन्होंने अग्रिम पंक्ति में रहकर अपना समर्थन दिया था। दिल्ली के ऐतिहासिक धरनों में भी उनकी सक्रिय उपस्थिति ने देश भर के युवाओं के मनोबल को बढ़ाने का काम किया था। रांची के इस मौजूदा आंदोलन में उनकी उपस्थिति से यह स्पष्ट हो गया है कि छात्रों का यह मुद्दा केवल प्रांतीय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और पारदर्शी व्यवस्था से जुड़ा एक बेहद गंभीर प्रश्न बन चुका है।
रांची में लगातार जारी इस विशाल आंदोलन में हजारों छात्र सड़कों पर डटे हुए हैं और भर्ती परीक्षाओं में पूर्ण पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। अभ्यर्थियों का कहना है कि पेपर लीक और अनियमितताओं में लिप्त दोषियों तथा भू-माफियाओं पर कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, साथ ही पारदर्शी और निश्चित समय सीमा के भीतर सभी लंबित परीक्षाओं का परिणाम और नियुक्तियां पूरी होनी चाहिए। बबीता के इस दौरे ने आंदोलनकारी अभ्यर्थियों में उत्साह भर दिया है और छात्रों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक वे पीछे नहीं हटेंगे, जिससे अब प्रशासन और राज्य सरकार पर ठोस फैसले लेने का दबाव और अधिक बढ़ गया है।
