गिरमिटिया देशों में हिंदी पत्रकारिता और साहित्य ,संस्कृति ,परम्पराने सामाजिक चेतना को दी नई दिशा : प्रो. आनंद वर्धन शर्मा
सूरीनाम में भारतीय आगमन दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य उद्घाटन.
गिरमिटिया देशों में स्वतंत्रता, शिक्षा, संस्कृति,परम्परा के संरक्षण में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका पर हुआ गंभीर विमर्श.
विदेशों में बसे भारतीयों का हृदय आज भी हिंदुस्तान के लिए धड़कता है : शारदानंद हरिनंदन
प्रणव कुमार अभय/ वाराणसी
सूरीनाम में भारतीय आगमन दिवस के उपलक्ष्य में “गिरमिटिया देशों में हिंदी पत्रकारिता एवं साहित्य का सामाजिक आंदोलन, स्वतंत्रता, शिक्षा एवं संस्कृति में योगदान” विषयक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन सत्र गुरुवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के के. एन. उडुप्पा सभागार में आयोजित हुआ. पत्रकारिता एवं जनसंप्रेषण विभाग, ग्लोबल गिरमिटिया काउंसिल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन का शुभारंभ महामना पं मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन , कुलगीत के साथ हुआ. इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता भेंट कर किया गया.
सम्मेलन के संयोजक एवं आयोजन सचिव प्रो. ज्ञानप्रकाश मिश्र ने स्वागत भाषण में कहा कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता और जीवन मूल्यों की वाहक है. उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा,संस्कृति को गिरमिटिया देशों में हिंदी पत्रकारिता और साहित्य ने भारतीय अस्मिता को संरक्षित रखने तथा नई पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. कहा कि आज भी भारत में हिन्दू ग्रन्थ जितने प्रासंगिक हैं उससे कम नहीं गिरमिटिया देशों में है, आज भारतीय मूल्य के दुनिया में संदेशवाहक का काम गिरमिटिया देशों के आमजन कर रहे हैं. आज पंचतंत्र की कथाएं उन देशों के घरों में सुनाए जाते हैं. वहां के लोगों के आराध्य देव श्री राम और श्री कृष्ण हैं।गिरमिटिया के देशों में कर्म का आधार गीता है. विषय प्रवर्तन करते हुए अरविंद पांडेय ने कहा कि गिरमिटिया देशों में हिंदी पत्रकारिता सामाजिक जागरूकता, शिक्षा के प्रसार और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रभावी माध्यम रही है. हिंदी साहित्य ने प्रवासी भारतीयों को उनकी मूल पहचान से जोड़े रखने में सेतु का कार्य किया है.

विशिष्ट अतिथि चिकित्सा विज्ञान संस्थान के संकाय प्रमुख प्रो. संजय गुप्ता ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक संवाद को सशक्त बनाने का कार्य किया है. आज आवश्यकता है कि हिंदी के वैश्विक स्वरूप और प्रभाव को और अधिक विस्तार दिया जाए.मुख्य वक्ता प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि गिरमिटिया श्रमिकों का इतिहास केवल प्रवास और श्रम की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, संस्कृति, भाषा और आत्मसम्मान की गौरवगाथा है. उन्होंने बताया कि गिरमिटिया श्रमिकों का प्रवास वर्ष 1834 में मॉरीशस से प्रारंभ हुआ, जिसके बाद भारतीयों को सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद एवं टोबैगो तथा गयाना सहित अनेक देशों में ले जाया गया। इनमें सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की थी.
उन्होंने कहा कि भारतीय प्रवासी अपने साथ केवल श्रम शक्ति ही नहीं, बल्कि भोजपुरी, अवधी, मैथिली, मगही और ब्रज जैसी भाषाओं के साथ समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं भी लेकर गए. इन भाषाओं का प्रभाव आज भी सूरीनाम की सरनामी हिंदी, फिजी हिंदी और मॉरीशस की क्रेयोल भाषा में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.
प्रो. शर्मा ने कहा कि प्रवासी भारतीय रामचरितमानस, कबीर की बीजक और श्रीमद्भगवद्गीता जैसे ग्रंथों को भी अपने साथ ले गए, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में उन्हें आध्यात्मिक और मानसिक संबल प्रदान किया. उन्होंने कहा कि जो लोग कभी ‘कुली’ कहे जाते थे, वे आज अनेक देशों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उच्च संवैधानिक पदों तक पहुंचे हैं तथा अपनी भारतीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत को आज भी संजोए हुए हैं. मॉरीशस में पत्रकारिता और मीडिया के विकास का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि प्रारंभिक दौर में विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा हस्तलिखित पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जाता था. मॉरीशस में रेडियो प्रसारण की शुरुआत वर्ष 1927 तथा टेलीविजन प्रसारण की शुरुआत वर्ष 1965 में हुई. हिंदी प्रसारण को सशक्त बनाने के लिए भारत से पंडित गिरजा शंकर को मॉरीशस आमंत्रित किया गया था. उन्होंने कहा कि आर्य समाज, सनातन धर्म मंदिर परिषद और हिंदू महासभा जैसी संस्थाओं ने प्रवासी भारतीयों के बीच हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. गिरमिटिया देशों में हिंदी पत्रकारिता और साहित्य ने सामाजिक चेतना को नई दिशा देने का कार्य किया है.

अतिथि वक्ता शारदानंद हरिनंदन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भले ही हम भौगोलिक रूप से भारत से दूर हैं, लेकिन हमारा हृदय आज भी हिंदुस्तान के लिए धड़कता है. भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं. उन्होंने कहा कि भारत में “गिरमिटोलॉजी” के अध्ययन एवं शिक्षण की औपचारिक शुरुआत की जानी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी प्रवासी भारतीयों के इतिहास और योगदान से परिचित हो सके.
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. सुषमा ढिल्डियाल ने कहा कि हिंदी भाषा विश्व समुदाय को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण शक्ति बन रही है. गिरमिटिया देशों का अनुभव यह सिद्ध करता है कि भाषा सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय चेतना का सबसे प्रभावी माध्यम है. कार्यक्रम का संचालन डॉ. अशोक कुमार ज्योति ने किया, धन्यवाद ज्ञापन बृजेश पांडेय ने प्रस्तुत किया. इस अवसर पर प्रमुख रूप से प्रो भुवाल राम,प्रो ज्ञानेश्वर चौबे,प्रो विद्योत्तमा मिश्र, प्रो विनोद पांडेय,प्रो ओंकार नाथ उपाध्याय,प्रो देवब्रत चौबे,चंद्रशेखर मिश्र,डॉ राजेश राय, कमलेश सिंह,डॉ बाला लखेन्द्र, रंजीत राय प्रांजल पांडेय के अलावा बिहार से पहुंचे प्रमुख बांसुरी वादक महर्षि अनिल शास्त्री, नीलकंठ फाउंडेशन के संस्थापक मनजीत त्रिपाठी, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार के राष्ट्रीय महासचिव डॉ अमित तिवारी, डॉ पंकज शुक्ला, माधव सेवा फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश तिवारी लूड्डू शामिल थे. उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा देश-विदेश से जुड़े विद्वानों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
